म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

थूं लाचारी नै मेटण सारू

आग लगा! म्हारी कविता!

थूं दीन-दुखी-निबळै-गरीब-रा

भाग जगा! म्हारी कविता!

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..! थे मिनख पणै सूं

इसड़ा लाड लडाया है।

मानखो देवता सूं ऊंचो है

इसा गीतड़ा गाया है।

है मिनख-मिनख अर पशु-पंछी

सारू प्राण चढ़ाया है।

इसड़ा मिनख हुआ

देवां सूं ऊंचा पद पाया है।

थे सत्त धरम नैं न्याय-नीति रो

सीधो पंथ बणायो है।

चोखै करमां रो चोखो फळ

निरग्रंथ-ग्रंथ सै गायो है।

सै जीवां सूं है मिनख श्रेष्ठ

वेदां री रिचा सुणाई है।

जीतै है दुरबल, पण दपेत

हारै सबळी असुराई है।

तप त्याग-दया-अनुराग-हेत री

खूब प्रतिष्ठा कीनी है।

पशु-पंछी-झाड़-झंखाड़ां तक

थारी कविता सुध लीनी है।

रामायण महाभारत रै मिस

इमरत रो मेह बरसायो है।

गौतम-महावीर जिसां री रसना

करूणा रो जस गायो है।

वां रै उपदेसां नै मूल्यां नै

पंथ बना म्हारी कविता।

नित-नित नवळै अरथां वाळा

नव ग्रंथ रचा म्हारी कविता।

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

थूं लाचारी नैं मेटण सारू

आग लगा म्हारी कविता।

थूं दीन हीन भूखै-गरीब रा

भाग जगा म्हारी कविता।

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

थे घणां दिनां तक

भांत-भांत रै रस रा गीत सुणाया है।

वीणा-तन्त्री रा तार-तार

वाणी रै पांण सजाया है।

गोरी री विरहण आंख्यां में

इतरा आंसूड़ा लाया है।

कै सागर छोटो पड़ै, गीतड़ा

वै घणा सवाया है।

बासन्ती फूल सजाया थे

कोयल रा बोल सुणाया है।

फूलां रै नीलम प्यालां में

दाखां रा दारू पाया है।

वन-वन में पंखीड़ा फुदक्या

घर-घर में बिहाग गाया है।

मधु-रितु रै स्वागत में पैली

गैली बण छन्द रचाया है।

तिरणै-तिरणै में आकरसण

रो इसड़ो रूप रचायो है।

कै इण धरती नै निरख-निरख

अमरापुर घणो लजायो है।

कामण रै सोळै सिणगारां रा

थे चितराम बणाया है।

नाजू रै नैणां डूब-डूब नैं

बारै-मासा गाया है।

उण हेत डूबियां रै जीवन में

त्याग सजा म्हारी कविता।

गोरू-गरीब री सिसक्यां सूं

अनुराग सजा म्हारी कविता।

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

थूं लाचारी नै मेटण सारू

आग लगा म्हारी कविता

थूं दीन हीन भूखै गरीब रा

भाग जगा म्हारी कविता।

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

कितरो विग्यान बध्यो, कुदरत री

कितरी माया तोली है।

धरती छोड नै अन्तरिक्ष में

नर री जय बोली है।

चंदरमा माथै धरती रै

जायां रै पग री धूड़ पड़ी।

मंगळ तक बध नै कुदरत रै

जादू री कड़ियां खोली है।

मिनखां नै सुखी वणावण नैं

कितरा उपाय इण कीधा है।

राकेट रेडियो ट्रांजिस्टर

टेलिवीजन ला दीधा है।

नै सल्य-क्रिया सूं मानव री

ऊमर बधी सवाई है।

अब ओखधियां रै पाण

सौ बरस तक रैवै तरूणाई है।

पण इण सूं कांईं? आज तलक

करसाण कमतरी भूखो है।

घणखारा प्राणियां रै सारू तो

सुख रो सागर सूखो है।

मैनत रै पाण जिको जीवै

वे तो सगळा रोवै है।

वां री घर नारी आंसूड़ा

टपकाती रोटी पोवै है।

वां रा बालक तरसै कपड़ै नै

दाणा सारू टीवै है।

वे निपट दुखी, लाचार घणा

भगवान भरोसै जीवै है।

करसाण-कमतरी रै मन में

थूं लगा ज्ञान म्हारी कविता।

बोदै कानून-कायदां नै

थूं परै बाळ म्हारी कविता।

थूं लाचारी नै मेटण सारू

आग लगा म्हारी कविता।

थूं दीन-हीन भूखै-गरीब रा

भाग जगा म्हारी कविता।

म्हारी कविता..!

म्हारी कविता..!

जग में कितरी है कुटळाई

कितरी बर्बर पीड़ा भीसण।

कितरो है ऊंच-नीच सोसण

कितरो पीलीजै है जन-जन।

कितरी है हिंसा प्रति हिंसा

आदम रो बेटो बण्यो नीच

निठूराई नागी नाचै है

नर पाप करै है आंख मीच।

भूखां री भूख बधै है नित

सेठां रा बधता जाय नोट

ज्यूं-ज्यूं विग्यान बध रह्यो है

मिनखां में बधतो जाय खोट।

संकड़ीजै है नीत झूंपड़ियां

नित बधै हवेली रा माळा।

चाटै है चंट चूंटियो घी

लूटीजै है भोळा-भाळा।

थूं भोळा-भाळा में हिम्मत रो

चेतो भर म्हारी कविता।

लाचारी हर म्हारी कविता

इंकलाब कर म्हारी कविता।

थूं लाचारी नै मेटण सारू

आग लगा म्हारी कविता।

थूं दीन-हीन भूखै गरीब रो

भाग जगा म्हारी कविता।

म्हारी कविता।

म्हारी कविता।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : नैनमल जैन ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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