ओढ़ां आभौ कांकड़ जलम्या
म्हे सिघां हां धोरां जलम्या।
सुण सुण रै मूंछ कटैला सुण
खुद री है कबर हठैला सुण
पूछां सूं बाळी ही लंका
मूछां रा बाजै हा डंका।
रगतां नाडी पल मं भरद्यां
हाका हमचे आळो करद्यां
ऊनो लोई घट-घट राखां
बांकड़ली मूंछा बट राखां,
कांई सगति गरब गुमाण करै
कांकड़ आंगण में सिंघ चरै
जद बिपदा आण पड़ी इण देस
वार्या चन्दण मायड़ इण देस।
काळी हान्डी मनवार लियां
हाथां चण्डी तलवार लियां।
म्हे परणां मरण त्यूंवार अठै
सगति पूजां जुझार अठै।
‘रायपिथौरा’ री सगतियां रो
जद झालर पै डंको बाज्यो
‘वा’ ‘वा’ सुण दूजो तीर चल्यो
‘गौरी’ पल में गळचा खा ग्यो।
पलकां आंसुड़ा बान्द लिया
करली मुन्डै शरतां पाटी
शूरवीर महाराणो खोली
आजाद्यां री टाटी।
रोयो कण-कण धूजी माटी
डरप्यो अम्बर धरती फाटी,
चितौड़ा री छाया पळनै
चढ़ग्यो चेतक हल्दी घाटी।
सै नार्यां लायां कूदकै
जद जौहर री ज्वाला धधकै।
म्हे सूरज नै कान्धै पाळां
तोपां गोळा जुड़ द्यो ताळा
म्हे काळ लिखां निज हाथां सूं
सत राखां ‘हाड़ी माथा ज्यूं।’
गाडोलण गड्या खुवांड़ा ज्यूं,
भाटा-भाटा पे अेक आग
राजस्थाणी सिर शेषनाग।
आ धरा जणै तो जणै घणा
झूपा में सिंघां जणै घणा
अकबर रा गोदम सामीं तो
म्हे चेतक रा असवार घणा
म्हे चेतक रा असवार घणा
म्हे चेतक रा असवार घणा।