पैली तो थे

कविता पाठ

कर-कर आता

जद बैंगण

अर पिचकेड़ा टमाटर

भोत ल्याता

में केई दिनां ताईं

साग बणाती।

याद है के

अेक बार थे

तरह-तरह का

जूता-चप्पल

थेलां भरकर ल्याया,

बीऽऽई

साल तो में

बदळ-बदळ कर

चप्पल पैरी

जूता–

बास पळियै नै

पहराया।

क्यूं जी।

अब बयांलकी

कविता बणाणी

भूलगा के?

में बोल्यो–

मैं तो

बै की बै

कविता सुणाऊं

जिकी–

बीस बरस

पैली सुणातो।

अब–

श्रोता समझै लागा,

बैंगण की जगां बेलण

टमाटर की जगां

अदवाड़ा फींकै लागा।

मंच पर तो

आक्रमण होताई

संयोजक का कमाण्डो

घेर लेवै,

बेलण और अदवाड़ा

घरां ल्याबा की

भूल कोनी करूं

नहीं तो मन्नै–

तूं आडो गेर लेवै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मुरली बासोतिया ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 12
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