तू लिखै

जकां रै वास्तै

कोनी-समझै बै

करसा’र कमतरिया

थारी कविता!

कोनी ओळखै

थारै मुखौटा लगायोड़ा

सबदां रो उणियारो!

मान ली तू

मनै ही

निज री हवस नै

हियै री संवेदणा!

गयो हो के कणाई

बीं रै घिनावतै झूंपै में

जको रोज आवै

बुहारण ने थारो जाजरू?

सोच्यो हो के कणाई

बीं नानकी तांई

जकी खाणियै गंडका स्यूं डरूं फरूं

ल्यावै दिनुगा पैली

पिसा’र थारो चून?

दीन्ही के कणाईं

थारी फाटी मोचड़्यां

बीं छोरै नै

जको उबाणैं पगां

नाखै दोपारां री लाय में

बळीतै रो भारो?

बंधायो हो के

बीं अधमाणस रै

टूट्योड़ै हाथ रै पाटो

जको छांग’र नी रै

थारी छ्याळी नै लूंग?

कर तू चीत

दाब्यो हो के कणाईं

कलम मेल’र

धण रो दूखतो माथो?

धोया हा के कदेई

अड़ी-अड़ांस में

जायोड़ां रा पोतड़िया?

कोनी करै के तू

पड़्यां मोको

निज स्यूं निमळै रै डोको?

दे पड़ूत्तर

मत कर छिड़ो चौको,

पण तू बो को

फिरै लु को तो

साच स्यूं मूंडो,

धायोड़ो मींढको

बोलै कुवै में उंडो?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कन्हैयालाल सेठिया ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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