जमीं सूं इधक धीजाळौ

उफणता सैंड़ाऊ हेज रौ हंजलौ

वौ जिणरै खोळ्यै जीवता हा

टाबर अर चिड़कल्यां

अखन काचा बिरछ लगौलग

उणनै निरख्यां लखावतौ बिरौबर

जांणै वौ व्हैवै पसर्योड़ी हरियल दूब री

रूंवाळी सूं लकदक

कोई जीवतौ मुळकतौ दड़ौ

आपरी गत-मत में ढांण

ही आपौ आप सूं पूगती पिछाण

ऊपरै माथा में

हरमेस पांगरता रेसमी विचारां रा तांता

झीणा अर साफ

न्यारा न्यारा तार-तार सबद

व्हैता जिका हर हाल में कविता

उपरै कानां रै आखती-पाखती बसती ही हरदम

लेहरिया भांत सरगम

उणरै सारू हजारूं-हजार कूंपळां

मुधरी बायरी रै मिस हींडा हींडती

गावती रैवती रम्मत रा गीत

रैवती निनादती कल-कल नंदी

ऊगेरता गीत फर-कर पांनड़ा

जोयलो गावतौ साव धीमी ढाळ में

धुर अड़ीरूंब साजती उणरी हाजरी

उणरी आंख्यां देख्यां

व्हैवतौ भोळी हिरणी री आंख्यां रो भरम

पांणी री बण्योड़ी

पांणी व्हैवतां जैज नीं करती

वो मिनख कांई

सैंरूप परकत हो।

सिकरा’र सत्राणां री झपट रै बैग

अचाणचक

अेक दिन खोटा सपना ज्यूं

उणरै माथा रा सळवटांदार गुवांळा माय

होळैसीक किणी धर दी अेक अदद बात

ज्या ही स्यात किणी कोरस री कड़ी

इण बात नै नीं दीरीज सकै कोई नांव

नीं उगनै कैय सकां विचार

नीं कविता, कथा, नीं दर्संन

उण आज दिन लग

पैली कदैई नीं सुण्यौ हौ अेड़ौ कोई जुमलौ

क'—'गरब सूं बोल थूं मिनख है'

वो मिनख तौ हथोको हौ

पण चावतां थकां नीं लखावती उण नै

आपरै ओळूँ दोलूं गुमेज जेड़ी कोई चीज,

घणीं घांणमथोल केड़ै

सेवट लीर-लीर व्हियां काळजौ

तिड़कीजता मन रा मांटी रै

तड़ाच देणी री

हालगी तेड़ साबत डील मांय

वौ उण घड़ी

उणीज पुळ

फाटग्यौ अधबीच सूं

देह रा व्हैग्या दोय फाड़ा

आधो-आध रगत आधूं-आध नाड़ां

बिखरग्यो संगीत—

परकत माथै व्हैगी प्रलै

अबै उणरा वै दोनूं अंग

आपरा खांडा बूचरा मूंडा सूं

कह्यां जावै हा न्यारा-न्यारा अेक धार

‘म्हैं गरब सूं कैवूं म्हैं मिनख हूं'

पड़ूत्तर री पड़गूंज गूँजै सागै री सागै

उणीज लय'र उत्ताई ऊंचा सुर में—

'म्हैं गरब सूं कैवूं म्हैं ईज मिनख हूं!

दोनूं मांय सूं कोई नीं जांणतौ,

नीं कोई मांनतौ

क' वै दोनूं अबै मिनख कोयनी हा।

स्रोत
  • पोथी : अंवेर ,
  • सिरजक : चन्द्रप्रकास देवल ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर ,
  • संस्करण : पहला संस्करण