सिरस रा रूंख री तरां

बढ़तो घीसू रो छोरो

सकालै-सकालै

घंटी अर बाटी

कांख में दबायां

टर्र…टर्र

भेड्यां नै टोरतो

निकळ जावै है

घर सूं।

वा नीं जाणै

वां री मोचड़ी रो

बढ़तो नाप देख’र

दादी-मां रै हिवड़ै

लाडू फूटै—

गीगलो जीता जी

मूंडो दिखावैगो

पड़ोता रो

अर बैकुंटी रै पाछै

पोतो फाड़ैगो

वां री कोथळी

गंगा में

अर, घीसू रो छोरो

गांव रै जंगळ

उड़ती चीलगाड़ी देख’र

धोरां में लुढ़कतो

नीं जाणै

वो कित्ती सदी लुढक्यो?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : हरदान हर्ष ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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