जे तूं हिमायती है मिनख रो

अर सिखाणो चावै है

मिनख नै मिनखपणो

तो अेक बार

ओज्यूं सिखाज्या रैदास

कै लोगां रा पांव रा फाला

तेरा हिया में घाव

कियां करै हा।

अेक बार ओज्यूं बोज्या

ईं धरती पै अपणेस रो बीज

अर कठौती सूं गंगा

अेक बार ओज्यूं उबकाज्या।

तूं अेक आखर नीं पड़्यो रैदास

जणां कियां पड्यो तूं

मिनख रो दर्द

गीता अर कुरान

तूं कियां बांची ही,

अेक बार ओज्यूं बताज्या रैदास

कै मोचड़ी सींवणै रो छप्पर

मिंदर कियां मानै लागा लोग।

मेरी चिंत्या नै

तेरो चिंतन दे रेदास

नहीं तो आखी धरती पै

मिनख रो बीज नीं बचैलो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम ‘अटल’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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