परमेसर नै म्हैं

सगळै ढूंढ्यो

पाणी, रेत अर पहाड़ां में

धोरां, नहरां अर पहाड़ां में

बारै-मांयनै सगळै ढूंढ्यो!

कठै कोनीं ढूंढ्यो म्हैं?

घर, बाखळ अर ओरां में

पण वो म्हनैं लाध्यो

फगत अर फगत

राजूड़ै में....

जद उण गरीब मजूर

म्हारी भुआ नै

आपरै सूक्योड़ै सरीर रो

दियो अेक यूनिट खून

उण बगत म्हैं

आखी धरती रो

सगळां सूं गरीब मिनख हो

अर राजूड़ो सगळां सूं अमीर

सांपड़दै भगवान!

स्रोत
  • पोथी : मंडाण ,
  • सिरजक : गंगासागर सारस्वत ,
  • संपादक : नीरज दइया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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