माथा में दो बाळ, लटक री पण चोट्यां तो तीन छै।

आज म्हांवळी मरवण इतरी फैशन में तल्लीन छै।

नकली नाइलोन का बाळां की बजार से लायी चोटी।

असी तरैं गूंथै’क सीस बण जावै सतरंज की गोटी।

हाथी, घोड़ो, ऊंट बजीर बणावै चट्टां में गूंथ’र।

आलू, गोभी, मूळी, बैंगण, बिस्कुट और डबल रोटी।

सैं हर नर का बादस्याह नै देबा की शौकीन छै।

मैं निरखी जूड़ा की छिब नै ऊंची गढ़ गिरनार-सी।

गोळ मकबरा का गुम्बद-सी लम्बी कुतुब मीनार-सी।

कटी लटां लटकै लिलाड़ पर जाळी झालरदार-सी।

ताज महल का दरवाजा पर ज्यूं मंड री हो फारसी।

छाया में भी चढ़्यो नाक पर रै चसमूं रंगीन छै।

आज म्हांवळी मरवण इतरी फैशन में तल्लीन छै।

तुळी-सो तन तंग खूखनू-कुड़तो, चुन्नी की जाळी।

रीतो बटवो लियां सड़क पर मटकै म्हारी मतवाळी।

पण माथां पर पांच सेर की नकली जुल्फां घुंघराळी।

ज्यूं खेतां में खड़ा बांस पर टंकी होय हांडी काळी।

क्यूं गादड़ा चरै साख, जिद अड़वो जीव विहीन छै।

आज म्हांवळी मरवण इतरी फैशन में तल्लीन छै।

सीता सीता रही सदा ही, अर दमयन्ती दमयन्ती।

अन्तर नहीं आज तक आयो, बीत गया जुग अणगिणती।

पण म्हारी नखराळी नै थे परकम्मा कर देखो तो।

सामांसै साधना दीखसी, अर बायां सै बैजन्ती।

दायांसै दुरगा खोटै तो पाछा सैं परवीण छै।

आज म्हांवळी मरवण इतरी फैसन में तल्लीन छै।

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : बुद्धिप्रकाश पारीक ,
  • संपादक : मूळचंद 'प्राणेश' ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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