घणी ताळ तांई

मत भाळ भोळी!

इण आभै रै सामी

अकड़ीज जावैली

थारी घांटी

थूं निरख अर परख

इण जमीं नै

क्यूं कै जलम सूं ले’र

मरण तांई

थारै काम आवैला

फगत जमीं

इण सारू

अळगी रैईजै

आभै रै छळ सूं।

आज दिन तांई

कोई नीं भर सकियौ

आभै नै बाथां में

पांख वाळा में

पांख वाळा

उड़ उड़’र थाक्या

नीं माप सकिया

इण रौ छेह अर पार

जाण लै थूं भोळी

बिरखा बीजळी

सुरजी री किरणां

चांद तारां नै

अै भमता बादळ

कुण वणाय सकै

आं नै आपणौ

थूं हेत कर नदियां सूं

भाखर सूं

थारै अंतस में

लैराय रियौ है समदर

क्यूंकै

थूं जुड़ सकै

फगत उण चीजां सूं

जिकां रौ जुड़ाव है जमीं सूं।

स्रोत
  • पोथी : आंगणै सूं आभौ ,
  • सिरजक : राजेशदुलारी सान्दू ,
  • संपादक : शारदा कृष्ण ,
  • प्रकाशक : उषा पब्लिशिंग हाउस ,
  • संस्करण : प्रथम
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