आखै दु:खां रो अेक हीज कारण है कै

म्हे करबा रा काम नीं कर्‌यां हां,

अर नीं करबा रा करर्‌या हां।

चरी में नीं चालणी में दूध भरर्‌या हां।

बताओ—

इंगरेजी रै सामै—

रास्ट्र-भासा हिन्दी री दुरदसा नीं हो री है?

दासी हंस री है, अर पटराणी रो री है।

हिन्दी दिवस मनाओ, लोगां ने मूरख बणाओ!

मर्‌योडां रो सराध जिमाओ।

सगळी भासावां सूं पुराणी,

संत, सूरमा, सुलखणा लोगां री—

ईं राजस्थानी नै इब तीं मानता क्यूं नीं दी?

ज्यां नै मानता दे मेली है—

बै कांई थां की मां भैण लागै है?

हिया रा फूटा, आठ करोड़ जनता री मायड़ भासा

सबद, साहित्य, अभिव्यक्ति, संसकिरती—

सगळा में ही सैं सूं आगै है।

जीं जामण रो दूध चूख्यो ऊं री तिथना ले

ईं सूं बेसी किरत घणी और कांई होवै है?

जो अठै सभा, सम्मेलना में—

ऊंनै मानता दिराबा री गरज-गरज'र हां भरै है नीं

बै कुपातर ही राज में ईं के तांई कांटा बोवै है।

सहायता प्राप्त सिक्षण संस्थावां रा करमचारी

कांई थांकी भैंस खोल'र लेगा—

जो सर्वोच्च न्यायालय रा फैसला—

अर राष्ट्रपति रै दसखतां री भी अवमानना करो हो।

जो थानै मिनख बणाया,

कुड़स्यां पै बिठाया

वां पै ही आप रो भसमासुरी हाथ धरो हो?

हूं…माटा अध्यापक दिवस मनावै है?

गरूआं नै रास्ट्र निर्माता बतावै है?

नीचै सूं जड़ काटै’र, ऊपर सूं सींचै है?

गरीब मास्टरां रा हक मार’र—

वां रा लुगाई, टाबरां रा कण्ठ भींचै है।

जे थे नुगरा अर लातां रा भूत—

आं रो ईंयां ही सोसण करता रह्या—

तो संघर्ष करतां करतां अेक दिन चन्नण सूं लपटां ऊठैला

अै चाणक्य, अै द्रोणाचार्य

थां को जड़ा मूल सूं नास कर देला।

भायां तीन कांई, तीन सो गांधी री जै बोलो—

तो ही जे थे करवा रा काम नीं कर्‌या

अर नीं करबा रा कर्‌या—

तो आजादी घणा दिनां नीं रहणी

दिन-दिन मुळक पिछड़णी है।

काळो टीको थां कै ही माथै कढ़णो है।

इतिहास थांनै कदां ही माफ करसी।

हू बूझूं हूं कै—

कसमीर, पंजाब समस्या

मिन्दर, मसजिद रो झगड़ो

मण्डल आयोग

हर्षद मेहता काण्ड

बोफर्स तोपां रो बवाल

राजीव गांधी री हत्या रो सुवाल

आं गुथ्यां में सूं अेक ही सलटी के?

संसद, विधान सभावां नै अखाड़ा बणा मेल्या है—

सूगली परम्परा पलटी कै?

बढ़ती जनसंख्या? बिगड़तो पर्यावरण?

मुंहगाई रो बधतो चीर? भिष्टाचार रो जिन्द

थां बापू रा आंधा, गूंगा, बहरा बानरा कनै

अेक रो ही उत्तर नीं है!

थां में राज करबा रा लोतर नीं है।

थां की अन्त्योदयी योजना—

कतरा'क अन्तहाळां से उदै कर्‌यो?

पंचवर्षीय योजनावां—

मुलक नै कतरोक आगै बढायो?

अकाल राहत—

कतरीक राहत पूगाई?

साक्षरता अभियान—

कतरा’क नै कक्का कोडीयो सिखाया?

आप रै मन दर्पण में झांको’र माथै राम राख'र बोलो

आं आंकडा रा सुनेरी बांकड़ा में

झूठ री कतरी’क चमक है?

कतरीक खाना पूरती है?

कतरा परसेंट खायो, भाई भतीजां नै बांट्यो—

अर कतरा परसेंट सांचाणी काम व्हियो है?

डाकण बेटा लिया ही लिया है अेक भी नीं दियो है।

मांयली, बारली म्हे अै सगली बातां जाणां हां,

थां नागां नें आछी तर्‌यां सूं पिछाणा हां,

पण रोवणो तो है कै—

जी जांघ नै उघाड़ां बा ही लाजै है।

अै घर का भेदी ही म्हाका भाई बाजै है।

हूं जाणू हूं कै म्हारी अेक-अेक बात—

थानै बळ-बळतै डाम ज्यूं लागैली।

याद राखजो अेक अेक दिन धरती जरूर जागैली।

अै बातां चावै खारी हो, पण खरी है।

जदां तीं जनता नै जीवण रा साधन—

सुरक्षा, न्याव सहज रूप में मिलसी

तदां नीं वांकै तांई पनरा अगस्त है,

छब्बीस जनवरी है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मुकेश मित्तल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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