अेक

हद सिणगार बण्या दीवाळी।
दिप-दिप दीपैं दीप दीवाळी।
हरख-निरख ज्यों ऊजळ दीवाळी।
सोळा सिणगार सुहाग दीवाळी।
धन-धन रूप रूपाळी दीवाळी।
आ-तो…
अेक दिवलो जगावां
जिण में
तन री बाती, मन रो घी,
तन-मन री जोत
जण-जण री जोत बणै
जगमग जगमग जोत दीवाळी।

दोय

इण हजारां दिवलां में
अेक दिवलो इसोई जगा दे
कै मिट जावै धुंध—
मन रा अंधेरा।
अेक आखर इसो ई लिखदे
कै हजारां दिवला जग जावै
दिवला सूं दिवलो जगै
आखर सूं आखर जगै
बुझता दिवलां कै
हथेळ्यां री ओट करदे
घर-घर दिवला जगमगै
दीपमाळका बण जावै।
स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बाबूलाल शर्मा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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