आटा में

रळा

ओसण

मठा

वट

तप

सेक'र

करारा कर

भरोसा सूं जीवै सपना

अर आंच देवै

धरती नै...

बगैर कोई सूं कीं मांग्या

क्यूंकै जग उण रो है

उण सूं ही है

हां! कीं देतां थकां

नीं राखै

अंगेई खंच

क्यूंकै

दाता

नीं हुवै

काठा!

स्रोत
  • सिरजक : किरण राजपुरोहित 'नितिला' ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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