म्हैं नी जाणूं

कबड्डी, लुकमीचणी, मारदड़ी

म्हैं तो जाणूं फगत-

‘पढाई, कंपीटीशन, डॅाक्टर, कम्प्यूटर’

जैड़ा ऊंचा सबद!

क्यूं कै

म्हनैं सांभ लेवै घरवाळा

टाबर सूं ज्यादा नंबर लावणा है।

अे तो बाद में होवता रैयसी!

खेलणो-कूदणो,

झौड़-झपाटो तो

टी.वी. में चालै आठूं पौर

पण डर जावूं कदी-कदी

कै होड

कठै ले जाय’र छोडैला म्हनैं!

स्रोत
  • पोथी : मंडाण ,
  • सिरजक : गंगासागर सारस्वत ,
  • संपादक : नीरज दइया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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