राजा कै राणीं-पटराणीं,
ज्यूं इन्दर घर इन्द्राणीं,
तीन देव आसीसै थं'नै-
हरिस्चन्द्र की महाराणीं।
सांची'क झूंठी या बाणीं?
बोल-बोल मेहतर-राणीं...?

जगत को मैलो ढोवै भोर संग ज़िन्दगी,
मनख्यां का मन की बी दूर कर गन्दगी,
ऐक रोटी सांटै पीढ्यां-पीढ्यां सूं या बन्दगी,
ऊंठ खा'र नही होई ऊठ्याड़ी-
थं'नै कदर अन्न की जाणीं।
बोल-बोल मेहतर-राणीं...

बड़ा-बड़ा लोग-बाग बड़ा-बड़ा दांव,
अंधेरा की आड़ मं ये उजाळा का घाव,
बैरी बण बैठ्यो गौरा डील को कसाव,
थं'नै जद बी देहळ बुहारी यांकी-
करी थंसूं ई मनमानी।
बोल-बोल मेहतर-राणीं....?

बस्ती की महतारी थारो गांव बारै बास,
नाळा घांट-पाट नाळा देवता का बास,
ऐक याही पीड़ा थारै डोलै आस-पास,
साता सूं काजळ नहीं आंज्यो-
सुख सूं कर् यो न घर-पाणीं।
बोल-बोल मेहतर-राणीं...?

भटबा का डर सूं मली न मजूरी कोई,
जाति हाळो सराप ढोतां-ढोतां याही होई,
गांठ की कमाई खोई चूल्हा की रसोई,
थारी सेवा कै आगै-
झूंठा पड़ग्या तपसी-ग्यानी।
बोल-बोल मेहतर-राणीं...?
सांची'क झूंठी या बाणीं...?

स्रोत
  • सिरजक : विष्णु विश्वास ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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