लालबत्ती री वेळा

पड़ गीवी निजर

ढब्बू बेंचणिया

एक टाबर माथै

जित्तौ वो दूबळौ

उत्ता इज उणरा ढब्बू गोळमटोळ

जित्तो वो बदरंग

लियां होठां कटाई

उत्ता इज उणरा ढब्बू रंग- बिरंगा

फूलां रै उनमान

जित्तो पस्त व्हीयौ थकौ

वो करै विणती भरी बंतळ

पण तौ धुरकारीजै लोगां सूं

दूजी कांनी

उणरा ढब्बू उतरा इज मस्त!

लै'राय- लै'राय करै बंतळ पून सूं

पोमीजै आपरी जूंण पर।

म्हनै निरजीव, सजीव लखावै

तौ सजीव, निरजीव!

पण सुण रै ढब्बू!

एकर थूं मानखै

अर कर दो-दो हाथ

कुळबुळावती भूख सूं

पछै देखूं प्यारा

कित्तीक लेवै थूं

लै'रां थारी जूंण री!

स्रोत
  • सिरजक : धनंजया अमरावत ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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