खुद री धरती रौ संगीत सै सूं मीठौ हुया करै

 

राजस्थान री धरती रा जाया जनम्या रफीक सागर लारलै कीं बगत सूं हिन्दी फिलम जगत में अेक संगीतकार रै रूप में अपणै आप नै थापित करण सारू संघर्ष कर रैया है। फिलम-इंडस्ट्री में तो सगळा ई आपरै नांव सूं वाकब है। नवी प्रतिभावां रा पारखी रफीक सागर हिन्दी फिलम-जगत नै कीं चोखा गायक ई दिया है। आज अै 5 हिन्दी फिलमां अर 20 भोजपुरी फिलमां रा संगीतकार है। ‘माणक’ रै सिनेमा-प्रेमी पाठकां सारू प्रस्तुत है इणां सूं कर्‌योड़ी भेंट-वार्ता भेंट करी है श्री अशफाक कादरी—

 

अशफाक कादरी :  रफीक साहब, सब सूं पैली आप आ बतावौ क संगीत री प्रेरणा आपनै किण सूं मिली?

 

रफीक सागर :  संगीत री प्रेरणा म्हनै म्हारै परिवार सूं ई मिली। म्हारौ जनम 1 नवंबर 1953 नै बीकानेर में हुयौ। म्हारा पिताजी शास्त्रीय संगीत रा चोखा गायक हा। उणां रौ नांव उस्ताद अल्लारखै खां साहब हौ। म्हैं बैन-भायां में सब सूं छोटौ हौ, सो वां रौ लाड म्हारै माथै अणूंतौ ई हौ। पण छोटी ऊमर में ई उणां रौ सायौ म्हारै सिर सूं उठग्यौ। वां दिनां म्हैं सातवीं कक्षा में पढतौ हौ। घर री हालत खराब हुवण सूं म्हनै पढाई छोडणी पड़ी। संगीत म्हैं बाळपणै सूं ई सीख रैयौ हौ। म्हारा उस्ताद शम्सुद्दीनखां चांदवानी साहब हा, जिका म्हनै शास्त्रीय संगीत री शिक्षा दिया करता। तौ, पढाई छोड’र म्हैं संगीत रै छेत्र रै में नांव कमावणे सारू कलकत्तै रवानै हुयौ।

 

अशफाक कादरी : तो कलकत्तै पूग’र आप कांई कर्‌यौ?

 

रफीक सागर : सन 1968  मे जद म्हैं कलकत्तै पूग्यौ तौ उठै म्हैं गजलां अर गीत गाया करतौ। उठै ई म्हारी चावै कव्वाल जानी बाबू सूं भेंट हुई। जानी बाबू म्हारै सूं प्रभावित हुय अर म्हनै बंबई लेयग्या। इण भांत सन् 1979 में बंबई पूग्यौ अर उठै स्टेज माथै गीत अर गजलां गावण लाग्यौ।

 

अशफाक कादरी : गजल-गायकी रै छेतर में आप किण सूं प्रभावित रैया?

 

रफीक सागर : इण छेतर में म्हैं मेहदी हसन जी सूं खास प्रभावित हौ, जिणां नै म्है 10-11 बसर री ऊमर सूं लगौलग सुण रैयौ हौ। उणी सूं गजल-गायन सारू नवा-नवा आइडिया दिमाग में आवता। उणां सूं मिलण री म्हारी घणी चावना ही। म्हैं तौ पाकिस्तान जा’र उणां सूं मिलण री सोच राखी  ही। पण म्हारौ नसीब हौ क सन् 1978 में कलकत्तै मांय अेक कार्यक्रम में उणां सूं भेंट हुयगी। उणी दिन सूं म्हैं उणां रौ शागिर्द बणग्यौ। म्हारै गायोड़ी गजलां रौ अेक अेल.पी. रिकार्ड अेच. अेम.वी. कंपनी कानी सूं सन् 1985 में ‘नवाजिश’ नांव सूं जारी हुयौ जिकौ घणौ पसंद करीज्यौ।

 

अशफाक कादरी : आपरौ फिलम लाइन में जावणौ किंया हुयौ?

 

रफीक सागर :  आ ई अेक दिलचस्प घटना है। बंबई में अेक कार्यक्रम मांय म्हारी भेंट चावा फिलम निरमाता-निरदेशक रामानंद सागर सूं हुई, जिणां रौ टी.वी. धारावाहिक ‘रामायण’ आज जगचावौ हुय चुक्यौ है। वै म्हारी गजलां सूं प्रभावित हुय’र आपरी हिन्दी फिलम ‘प्यारा दुश्मन’ में ’चांस’ दियौ। इण फिलम रा संगीतकार बप्पी लाहिड़ी हा। म्हारै गायोड़ौ गीत ‘अब के बिछड़े तो मिलें ना मिलें’ चोखौ चाल्यौ। पण बड़ी फिलमां में मौकौ नीं मिल्यौ। ‘भाई आखिर भाई होता है’, दो डाकू, ‘दिल का नशा’ इत्याद इणी-गिणी फिलमां में ई मौकौ मिल्यौ।

 

अशफाक कादरी :  अेक गायक रै रूप में तौ आप नै घणा मौका नहीं मिल्या, पछै संगीतकार किंया बणग्या?

 

रफीक सागर : म्हारै गजल-संग्रै ‘नवाजिश’ सारू ‘कम्पोजर’ री जरूरत ही। संयोग सूं चंदर जिस्यौ साथी मिलग्यौ। तद म्हारै दिमाग में संगीत-निरदेसन देवण री बात आई अर म्हैं औ काम सरू कर दियौ। संगीतकार रै रूप में म्हां दोनूं चंदर-रफीक सागर रै नांव सूं काम कर रैया हां।

 

अशफाक कादरी :  संगीतकार रै रूप में आपरी कांई सफळता रैयी है?

 

रफीक सागर : संगीतकार रै रूप में आज म्हारै कनै बीस सूं ई बेसी भोजपुरी फिलमां है। कीं फिलमां ‘रिलीज’ हुय’र चोखी चाल रैयी है तौ कीं सिल्वर जुबली मनाय चुकी है। हिंदी में ‘प्यार कंगना’ जिसी फिलमां म्हांरै कनै  है। अेक बात म्हैं बताय दूं कै आं सगळी फिलमां में म्हारै गायोड़ा गीत ई सामल है। अेक फिलम में तौ ‘हीरो’ ई म्है ई हूं। पण फेरूं ई समरपित तौ म्हैं संगीत नै ई रैवूंला।

 

अशफाक कादरी : आप आज तांई कुण-कुण सै गायकां नै आपरै संगीत-निरदेसण में गवाय चुक्या है?

 

रफीक सागर :  म्हे फिलमी दुनिया रै लगै-टगै सगळै ई चोटी रै गायकां नै म्हांरै संगीत-निरदेसन में गीत गवाय चुक्या हां। महेन्द्र कपूर, मोहम्मद अजीज, चंद्राणी मुखर्जी, सुलक्षणा पंडित, सुरेश वाडकर, अनुराधा पौड़वाळ इत्याद सूं घणा ई गीत गवाया है। केई नवै गायकां नै म्हे ‘ब्रेक’ ई दियौ। दरअसल म्हैं म्हारै संघर्ष नै आज तांई नीं भूल्यौ हूं।

 

अशफाक कादरी : आप तौ राजस्थान रा जाया-जनम्या हौ। आपरौ राजस्थानी फिलमां में संगीत देवणौ क्यूं नीं हुयौ?

 

रफीक सागर : म्हैं राजस्थान रौ जायौ-जनग्यौ हूं, सो अठै री माटी रै गीत-संगीत सूं दूर रैवण रौ तौ सवाल ई पैदा नीं हुवै। पण आज तांई राजस्थानी फिलम निरमाता म्हनै इण सारू कदैई मौकौ ई नीं दियौ।

 

अशफाक कादरी : आज री राजस्थानी फिलमां रै संगीत बाबत आपरा कांई विचार है?

 

रफीक सागर : आज री राजस्थानी फिलमां रौ संगीत आपरी धरती अर माटी सूं कट्योड़ौ है। सगळा ई गीत हिन्दी फिलम संगीत री तरज माथै त्यार कर्‌योड़ौ है। आज संगीतकार शुद्ध राजस्थानी धुनां अर वाद्यां नै ले’र गीत त्यार करण रौ ‘रिस्क’ नीं उठावणा चावै। वै तौ आज रै बाजार रै मुताबिक गीत त्यार करै। जे म्हनै कदैई मौकौ मिल्यौ तौ म्हैं जरूर कोई नवौ अंदाज दिखासूं।

 

अशफाक कादरी : आखिर में, राजस्थानी फिलम-संगीत रै प्रेमियां नै आप कांई कैवणौ-चावै?

 

रफीक सागर  : म्हैं आई कैवणौ चावूं क सगळा ई चोखै संगीत नै प्रोत्साहित करावै, जिणसूं नवी-नवी प्रतिभावां नै ई मौकौ मिलै। खुद री धरती रौ गीत-संगीत ई सै सूं मीठौ हुया करै।

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : रफीक सागर सूं अशफाक कादरी री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : जनवरी 1989
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