अमरीका रा बासिंदा अर वठै ई भासा-विज्ञांन रा प्रोफेसर काळीचरण बहल बरोबर 10 बरसां री मैणत सूं राजस्थांनी भासा री व्याकरण त्यार कीवी। लारला दिनां जद वै जोधपुर सूं पाछा अमरीका जावै हा, तौ इण बिचाळै वां सूं बात-बतळाव रो औचक अर नांमी संजोग म्हांनै मिळियौ। वां सूं भेंट कीवी ‘माणक’ रा सम्पादक तेजसिंघ जोधा।

 

तेजसिंघ जोधा : आप सिकागौ विस्वविद्यालै रै कुण सै विभाग में कांम करौ?

 

काळीचरण बहल : म्हैं वठै दिखाणादै अेसिया री भासावां अर भासा-विज्ञांन, आं दोनूं विभागां में हिंदी रौ प्रोफेसर हूं। सिकागौ विस्वविद्यालै जिणनै खुद रौ दिखणादै अेसिया रौ प्रोग्रांम कैवै, उण में भारत, पाकिस्तांन, नैपाल अर लंका जैड़ा केई देस आवै। म्हांरौ विस्वविद्यालै भासा रै जरियै आं देसां री संस्क्रती री पूरी तरियां जांण-पैचांण अर छांण-बीण रौ काम करबौ चावै। इणीं कांम रै सीगै भारत री भासावां अर खासकर राजस्थांनी भासा म्हारी स्टेडी रौ विसै बणी।

 

तेजसिंघ जोधा : थे राजस्थांनी भासा रौ, थांसूं पैली होयोड़ौ व्याकरण रौ कांम देख्यौ होसी, उणरै बाबत कांईं कहस्यौ?

 

काळीचरण बहल :  असल में म्हैं राजस्थांनी भासा री व्याकरण माथै म्हारौ कांम, पैलां होयोड़ौ व्याकरण रौ कांम देख्यां-जाण्यां पछै ई सरू कियौ। अठै रा देसी विदवांनां में रामकरण जी आसोपा, नरोत्तमदासजी स्वामी अर सीतारांमजी लाळस इत्याद रौ कांम म्हारै देखवा में आयौ अर परदेसी विदवांनां में केलॉग, ग्रियरसन, टेसीटरी अर अैलन रौ कांम म्हैं देख्यौ। आं लोगां रा कांमां रै बाबत जे म्हैं अेक ई ओळी में कैऊं तौ आ ई कहस्यूं के ‘दे ऑल आर वैरी अैलीमेंटरी ग्रामर।' म्हैं ‘परम्परा’ सोध पत्रिका रै अेक अंक में आं सब लोगां रै कांम री खामियां रै बाबत न्यारी-न्यारी अर विस्तार सूं आळोच कीवी। आप उण अंक नै देखजौ। ज्यूं टेसीटरी तौ फगत जैनी साधुवां रा ग्रंथां नै आधार बणग्या, ज्यां में के ‘अे’ री मात्रा ‘अेय’ अर ‘ओ’ री मात्रा ‘अउ’ लिखीजवा में आवै, इणसूं उणरै कांम में केई गलतियां रैगी। सीतारांम जी वगैरा रौ जोर खाली सबदां रा ‘रूपावळी’ देवण माथै रह्यौ। ‘छोरौ, छोरा, छोरां’ लिखबौ ई ग्रामर कोनी। सिनटेक्स (वाक्य विन्यास) जरूरी होवै। वाक्य कीकर बणै, कीकर जुड़ै अर कीकर विछेदीजै, अैड़ी घणी सारी बातां री डिटेल में जावणौ पड़ै। म्हैं जिकौ व्याकरण लिखियौ, उणमें बख पड़तां जितरी दूर तांई म्हैं जाय सकतौ, पूरी ‘डिटेल’ में जावा री कोसिस कीवी। म्हारी व्याकरण में म्हैं ‘प्रत्यय’ माथै ई काफी ध्यांन दियौ। अेक-अेक ‘प्रत्यय’ सूं सौळा-सौळा हजार तांई सबद बणै।

 

अठै रा लोकगीतां में ईं ‘प्रत्यय’ लाग’र नवा सबद बणवा रौ कांम ठाडौ। ज्यूं लोकगीतां में ‘चिड़ी’ नै ‘चिड़कली’ कहीजै। इण में ‘क’ अर ‘ल’ दो प्रत्यय लागा। अेक बार म्हैं म्हारा अेक दोस्त नारायणसिंघजी सांदू रै अठै चाय पीवतौ हौ, म्हैं कीं मौटै कप में चाय पीवूं। वै कैवण लागा थे तौ कप में नीं ‘कपीड़’ में चाय पीवौ। ‘ईड़’ प्रत्यय लागगौ तौ अरथ में मूळ चीज रौ आकार मोटौ व्हैगौ।

 

‘प्रत्यय’ रै भेळ सूं कितरी ई भांत रा नवा अरथ सबद में आय जावै। यूं तौ आपां ‘बकरी’ नै साधारण तौर सूं ‘बकरी’ कैवां पण जे अपमांन करबौ चावां तौ ‘बकरड़ी’, 'छाळती’ इत्याद सबद कांम में लेवां। यूं ई 'घोनौ’, ‘टाटौ’ इत्याद कैय’र उणनै पुरलिंग करदां। आंम तौर सूं भासा-वैज्ञानिक लिंग भेद होयां अरथ में फरक कोनी मांनै, पण भारत री भासावां में लिंग भेद सूं अरथ में निरौ फरक आय जावै।

 

तेजसिंघ जोधा : आप राजस्थांनी भासा रौ व्याकरण बणावतां कांईं ‘अैप्रौच’ राखी?

 

काळीचरण बहल : म्हैं सिनटेक्स (वाक्य विन्यास) अर सिमटेक्स (अरथतत्व) माथै ज्यादा जोर दियौ। वाक्य विन्यास रै साथै अरथ-तत्व नै समझणौ ई जरूरी होवै। ज्यूं म्हैं विजयदांन जी देथा री अेक कथा में अेक ई सबद रा केई रूप देख्या। ‘पूंछ’, ‘ पूंछड़ी’, ‘पूंछड़ौ’, ‘पूंछड़ियौ’। म्हैं वांनै आं सबदां रौ अरथ-भेद पूछ्यौ, पण वै नीं बताय सक्या। अब इणमें भासा रा दोय तत्व साथै-साथै चालै। अेक नै फोनेटिक सिस्टम (अभिसंग्यक तत्व) कैवै अर दूजै नै अेक्सप्रेसिव (अभिव्यंजक)। अभिव्यंजक में वक्ता कोरौ आप री बात ई कोनी कैवै, उणरै साथै आपरौ कमेंट ई मिळाय दै। सबद रै साथै खुद रे रुख रौ रंग ई भेळ देवै।

 

तेजसिंघ जोधा : कांईं राजस्थांनी भासा रौ समूदौ सभाव ई इण भांत रौ अभिव्यंजक सभाब कोनी?

 

काळीचरण बहल : राजस्थांनी भासा ई क्यूं हिन्दुस्तांन री सगळी भासावां इण भांत री कमेंटरी सूं भरियोड़ी लाधै। आज तांई इण तत्व माथै किणीं ध्यांन कोनी दियौ। म्हारी राजस्थांनी व्याकरण में आपनै आं दोनूं अभिव्यंजक अर अभिसंग्यक ततवां रै आधार माथै विवेचण मिळसी। म्हैं दोनूं तत्वां में फरक बतावण सारू अेक छोटौ सौ पाठ ई अलग सूं दियौ।

 

तेजसिंघ जोधा : कांई थांरौ औ कांम परम्परा वाळै अंक ‘ऑन द प्रजैंट स्टेट ऑफ मोडर्न राजस्थांनी ग्रामर’ रौ ई विस्तार लियोड़ौ रूप कोनी?

 

काळीचरण बहल : ना ना, वा खाली आळोचणा ही अर उणमें तौ नमूनै सारू ई कीं थोड़ा-घणा अंस म्हैं दीन्हा। पण अब जिकी लिखी, वा तौ न्यारी-निरवाळी अर आपोआप में पूरी व्याकरण है। वौ तौ सरूपोत रौ कांम हौ, जिण नै म्हैं साल-डेढ़ साल में निवेड़्यौ, पण इण पूरी व्याकरण नै लिखवा में तौ म्हनै 6-7 साल रौ बगत लाग्यौ। आ ढाई सौक पेज री किताब होसी, इणरी छपाई रौ कांम ई सरू व्हैगौ पचासेक पेज तौ छपईगा। राजस्थांन सोध संस्थान, चौपासणी इण व्याकरण नै प्रकासित करसी।

 

तेजसिंघ जोधा : राजस्थांनी री व्याकरण सूं निवड़ियां पछै आं दिनां आप कुण सौ कांम देखौ?

 

काळीचरण बहल : लारला तीन बरसां सूं राजस्थांन रै ‘फोकलोर’ री ‘स्टेडी’ रौ कांम देखूं। अठा रौ ‘फोकलोर’ म्हनै खबू ई अैक्सप्रेसिव लागै, अर अठै मैटिरियल ई आराम सूं हाथै आय जावै। इण वास्तै म्हारौ ध्यांन फोकलोर री तरफ गयौ। इण फोकलोर सूं ईं म्हैं लिंग्विस्टिंक्स री तरफ ई जास्यूं। लिंग्विस्टिक्स में ईं फगत सिमिटिक्स (अरथ तत्व) ई म्हारी दिसा होसी। म्हारी कोसिस ‘अैक्सप्रेसिव’ अर ‘कोगनेटिव सिस्टम’ नै मिळाय’र ‘थॉट प्रोसेस’ (लोगां रै सोचवा रै तरीकै) तांईं पूगवा री रैसी।

 

तेजसिंघ जोधा : लोक साहित अर लोक संस्कती रै इण कांम में राजस्थांन री सोध-संस्थावां अर दूजा सोध विदवांनां सूं ईं आपनै कीं मदद मिळी होसी?

 

काळीचरण बहल : राजस्थांन में तौ कोरौ रूपायन संस्थांन बोरूंदा में ईं थोड़ौ घणौ कांम लोक साहित अर लोक संस्क्रती रौ होवै, बाकी सोध संस्थावां नै तौ हथ-लिखिया ग्रंथा रै धंधै सूं ईं फुरसत कोनी।

 

तेजसिंघ जोधा : रूपायन रौ कांम आपनै कीकर-कांईं लागै?

 

काळीचरण बहल : रूपायन अर संगीत नाटक अकादमी वाळा फगत कीं टाळवीं चीजां नै ई आपरी स्टेडी रै आंटै लेवै, जद के म्हैं आडै-ई-कट फोकलोर री अेकू-अेक चीज नै म्हारी स्टेडी रौ विसै मानूं।

 

म्हैं म्हारी स्टेडी सारू अैक्सपर्ट लोगां री मदद लेवणौ ई वाजिब कोनी समझूं, क्यूंके वै आप प्रोफेसनल व्हैगा अर वांरा पाळ्योड़ा कलाकारां में ईं औ-रौ-औ नुगस आयगौ, सो अै दोनूं ईं म्हारै कांम रा कोनी, म्हैं तौ म्हारी स्टेडी सारू सीधौ गांव-देहातां में अर साधारण लोग-बागां रै बिचाळै जाय पूगूं।

 

तेजसिंघ जोधा : राजस्थांन में होवतौ भासा, साहित अर संस्क्रती री सोध-खोज रौ कांम आपनै किण स्तर रौ लागै?

 

काळीचरण बहल : अेक तौ ‘सिस्टैमैटिक वे’ रौ अभाव दीसै अर दूजौ अठै रा स्कोलर मैणत करवा सूं बचै। पैला होयोड़ै कांम नै ई ऊंधौ-पाधरौ कर पोथ्यां छपावण में लाग्योड़ा रैवै। आपनै इचरज होसी 1936-38 में कलकत्ता रिसर्च सोसाइटी सूं नरोत्तमदासी स्वामी, रामसिंघजी अर अेक कोई दूजौ, आं तीनां री सम्पादन करियोड़ी राजस्थांनी लोकगीतां री दोय पोथ्यां छपी, आं रै पछै आज तांईं राजस्थांनी लोकगीतां री जितरी पोथ्यां आई, वै आं ईं पोथियां री नकल दीखै। ‘फोकलोर’ में ‘कॉपी राइट’ रौ तौ टंटौ कोनी। अेकाधौ नवौ गीत जोड़्यौ अर पोथी त्यार करली।

 

तेजसिंघ जोधा : अब तौ आपनै राजस्थांन में आवतां अर कांम करतां 10 बरस व्हैगा, अमरीका रै अर अठा रै जीवण में आपंनै कांईं फरक लागै?

 

काळीचरण बहल : समझ में नीं आवै के औ फरक म्हैं आपनै किण ठौड़ सूं बतावणौ सरू करूं। लारली साल गरमियां में म्हारौ लड़कौ म्हारै साथै भारत आयौ। उणरी ऊमर नीठ 12 बरस व्हैला। अठै रा लोगां नै देख्यां कैवा लागौ के अै लोग तौ खुद री बात नै ‘कन्ट्रोडिक्ट’ करै। यूं तौ कैवै के फलांणौ म्हांनै चोखौ लागै, पण सगळै दिन उणरी काट अर बुराई करता कोनी संकै। कीं ठा ई कोनी पड़ै के वौ आंनै चोखौ लागै के ओखौ? म्हैं कह्यौ के औ विरोधाभास कोनी अठै भूंड अर भलाई दोनूं आरांम सूं साथै-साथै चालै। औ तौ अठै रै जीवा रौ ढंग। अै लोग दोय ‘अैक्सट्रीम्स’ नै आसांनी सूं मिळाय लै।

 

तेजसिंघ जोधा : ‘माणक’ रै जनवरी अंक में आप कोमलजी कोठारी रौ इन्टरव्यू बांच्यौ व्हैला, वै कह्यौ के परदेसियां नै सोध-खोज री मूळ सामग्री अर उणरा सोर्सेज भारत में ईं बणायोड़ा राखणा चाहिजै, आप इणरै बाबत कांईं सोचौ?

 

काळीचरण बहल : म्हांरी जिम्मैवारी दोवड़ी है। सोर्सेज अठै ई रैवणा चाहिजै, अर दुनियां रै मुंडागै ई पूगणा चाहिजै। ‘फोकलोर’ माथै कांम करतां म्हैं जिका ‘टेप्स’ अठै त्यार करस्यूं, वांरै बाबत पक्कौ इरादौ राखूं के राजस्थांन में किणीं ट्रस्ट री मारफत के किणीं दूजै तरीकै सूं अेक लाइब्रैरी कायम करूं अर उण में वां ‘टेप्स’ री अेक-अेक कॉपी मौजूद रैवै, जिणसूं के अठै रा विदवांन जद-कदैई फोकलोर माथै कांम करबौ चावै, तौ वांनै मदद मिळ सकै। म्हारौ कांम अठै रा लोगां वास्तै मददगार साबित नीं होवै, अैड़ी म्हारी मनस्या बिलकुल ई कोनी।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थांनी मासिक) ,
  • सिरजक : गजानन वर्मा ,
  • संपादक : तेजसिंघ जोधा ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाश ,
  • संस्करण : अप्रैल 1981
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