शर्मनाक स्थिति खातर खिलाड़ी खेल अधिकारी अर सरकार तीनूं जिम्मेदार

 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर माथै जद ई ‘शूटिंग’ री बात चालै तो बीकानेर रै करणीसिंहजी रौ नांव घणै आदर-सम्मान सूं लियौ जावै। आप अेक भोत मानीता निसाणैबाज हो। आखै अेशिया में आप जठै ऊंची अर मानीजती जग्या बणाई है, बठै आखी दुनिया में ई इणां री निसाणैबाजी रौ प्रदरसण भोत ई उत्साहवर्धक कैयौ जा सकै। करणीसिंहजी रै मुकाबलै में बराबरी करणै आळौ निसणैबाज आज ताई देखण में नी आयौ। लारलै दो-तीन बरसां सूं आप ढळती ऊमर रै कारण निसाणैबाजी री प्रतियोगितावां में भाग नीं ले रैया है। फेर ई आप निसाणैबाजी री कला रौ ऊंचौ प्रदरसण करण री खिमता राखै। प्रस्तुत है ‘माणक’ रै पाठकां सामी आप सूं लारलै दिनां कर्‌योड़ी बातचीत। आ बातचीत करी है श्री जे. अेस. बावा।

 

जे. अेस. बावा : आप निसाणैबाजी कद सूं सरू करी?

 

करणीसिंह : म्हारी उमर जद 6-7 साल री ही, तद म्हैं निसाणैबाजी सरू करदी ही। उण बखत म्हारा दादौ सा महाराजा गंगासिंहजी म्हनै निसाणैबाजी रा गुर सिखाया अर इण सूं संबंधित सगळी बारीक बातां री जाणकारी कराई। बाद में ‘क्ले पिजन’ निसाणैबाजी री ई पूरी जाणकारी दीवी। बै ई म्हारा पैला अर छै’ला गुरु हा। बां री छत्तर छींया में म्हारौ निसाणैबाजी रौ अभ्यास हुवतौ रैयौ।

 

जे. अेस. बावा : आप कद-कद विश्व-स्पर्धावां में भाग लियौ?

 

करणीसिंह :  बियां तो म्हैं सैकडूं प्रतियोगितावां में भाग लियौ हूं, अर लगौलग लेवतौ रयौ हूं। सन् 1960 सूं 1980 रै बीच अेकर भाग नीं लियौ, बाकी तो सगली प्रतियोगितावां में बरौवर भाग लेवतौ रैयौ।

 

सन् 1976 रै ‘मांट्रियल ओलंपिक’ में भाग लेवतौ तो म्हारौ नांव ‘गिनीज बुक आप वर्ल्ड रिकार्ड’ रै मांय सगळा सूं आगै री हिस्सैदारी में आय जावतौ। खैर, नीं मालम कितरी प्रतियोगितावां हुसी—जिणां में म्हैं भाग लियौ है। नांव गिणाणा सरू करूं तो अेक भोत बडी सूची बण जावैली।

 

जे. अेस. बावा : आप आपरी जिंदगाणी मांय पशु-पक्षियां रा सिकार कर’र ई निसाणैबाजी रौ अभ्यास कर्‌यौ हुसी?

 

करणीसिंह : म्हैं म्हारी जिंदगी मांय किणी निर्दोष जीव-जिनावरां माथै बंदूक नीं उठाई।

 

जे. अेस. बावा : लोग तो निसाणौ लगावती वखत अेक आंख मीच लेवै पण देखां, आप दोनूं आंख्यां खुली राख’र निसाणौ लगावौ?

 

करणीसिंह : देखौ सा, भगवान आपां नै देखण नै दो आंख्यां दीवी है, जिणसूं हर जिनस नै आपां साफ देख सकां। म्हारी मानता तो आ है के निसांणै रै लक्ष्य री दूरी अेक आंख री बजाय दोनूं सूं आपां ज्यादा सही देख सकां। म्है दोनूं आंख्यां खुली राख’र निसाणौ इण खातर लगावूं के निसाणौ ठीक अर सही लगायौ जा सकै।

 

जे. अेस. बावा : अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपरै लारै रैवण रौ कारण?

 

करणीसिंह : म्हारै लारै रैवण रौ कारण अेक इज है के आपां ईमानदारी सूं अभ्यास नी करां, आपणा निसाणैबाज विदेशी निसाणैबाजां सूं किणी बात में कम नी है। पण अठै रा लोग भोत लापरवाह है। निसाणैबाजी में अेक नंबर सूं ई लारै रैयग्या तो भोत लारै मान्या जावै, जद के दूजा खेलां में आ बात नीं हुवै। ईं खेल में ‘तमगा’ सूं खिलाड़ी रौ मूल्यांकन नीं हुवै।

 

जे. अेस. बावा :  आपरौ सगळां सूं बढिया प्रदरसण कद हुयौ?

 

करणीसिंह : सन् 1960 में हुयै ‘रोम ओलंपिक’ रै प्रदरसण नै म्है म्हारौ सै प्रदरसणां सूं आछौ मानूं। इण में म्हारौ आठवौं नंबर रैयौ, पण म्हनै उण सूं संतुष्टि है। सन् 1962 में कोहिरा विश्व क्लेपिजन निसणैबाजी में म्हनै चांदी रौ तमगौ मिल्यौ। अेन वखत माथै जे म्हारी बंदूक खराब नी हुवती तो सोनै रौ तमगौ म्हनै जरूर मिलतौ। आं विश्व प्रतियोगितावां में कर्‌योड़ै म्हारै प्रदरसण नै आज ई म्है सगळां सूं श्रेष्ठ मानूं। आं में दो सौ निसाणां में सूं अेक सौ अट्ठाणू निसाणा म्हारा अेकदम सही लागा।

 

जे. अेस. बावा  :  निसाणैबाजी रौ शौक घणौ महंगौ हुवै। इण में कोई मिनख आगै कियां बढ सकै?

 

करणीसिंह : आपरौ फरमावणौ सही है। पण किणी मिनख में आपरौ शौक पूरौ करण री लगन हुवै तो उणरौ रस्तौ ई भगवान आपै ई निकाळ देवै। पण दुख इण बात रौ है के सुविधावां रै अभाव सूं कई प्रतिभावां सामी नीं आय सकै, आपणै हर खेल में असुविधावां री बातां सुण-सुण’र घणौ ई दुख हुवै। इणी रौ ध्यान राख’र ई म्हैं अेक ट्रस्ट री थापना करी है, जिणरौ खास ध्येय आपणी प्रतिभावां नै आगै लावण रौ है। हां, आ बात साव सांची है के असुविधावां रै कारण आपणौ मुलक सही प्रतिनिधित्व नीं कर पावै।

 

जे. अेस. बावा : आप आपरै अनुभवां रौ प्रयोग इण में कर्‌यौ?

 

करणीसिंह : हां, कर्‌यौ, पण थोड़ै मिनखां मांय। म्हारी सदा सूं ई मनस्या रैयी के म्हैं म्हारै अनुभवां रौ लाभ दूजां नै देय सकूं, पण नुंवी पीढी रै लोगां में उछाव ई नीं दीखै। पुराणै खिलाड़ियां री ज्यूं आपरै खेलां रै प्रति नीं तो निष्ठा ई राखै अर नीं ई समरपण रा भाव। म्हैं 20 बरस इण खेल में लगाया। आज रा लोग तो 20 म्हीना ई देवणा नीं चावै। ओ कोई जादूमंतर तो है नी जिकौ रातूं रात अलादीन रै चिराग री ज्यूं त्यार हुय जावै अर नीं ई म्है की जादू जाणूं जिकौ लोगां नै इतरा बेगा त्यार करदूं। आपरी लगन अर रोज री मैनत ई काम आवै।

 

करणीसिंह : म्हारै सुणण में आई है के बीकानेर में आप कोई ‘शूटिंग रेंज’ री थापना करी है?

 

करणीसिंह : करी तो है, पण कोई भाई सीखण नै आवै ई नीं। लोगां नै इण बात रौ पतौ हुवणौ चायै के बीकानेर में ‘क्लेपिजन’ निसाणैबाजी री सगळी मशीनां अर व्यवस्था है। आपणै देस में इण भांत री समुचित व्यवस्था नी हुय सकी है। म्हैं म्हारी सरधा मुजब व्यवस्था जरूर करी है। पण अेकलौ करणीसिंह के-के कर सकै है? आपणै देस में नीं तो प्रशिक्षण री व्यवस्था है अर नीं इण में काम आवण वाळा कारतूस ई बणै। बारै सूं मंगावण पर पूरौ प्रतिबंध है। सरकारी प्रोत्साहन री तो बात ई छोड़ौ।

 

जे. अेस. बावा :  इण पिछड़ै पण नै दूर कियां कर्‌यौ जा सकै?

 

करणीसिंह : कोई खिलाड़ी जे सुविधावां रै प्रभाव रै कारण पिछड़ रैयौ है तो सरकार रौ कर्तव्य हुय जावै के उणरी सहायता करै। चायै बो किणी ई भांत रौ खिलाड़ी क्यूं नीं हुवै। आपं दूजी बातां माथै लाखूं रिपिया खरच करां, आपणी सरकार अेशियाड जिस्यौ आयोजन करियां रै बाद ओलंपिक खातर ई आपरौ दावौ पेश कर्‌यौ है। पण इणसूं देस नै कांई लाभ हुसी, जदकै आपणै खिलाड़ियां कानी सरकार बिलकुल ध्यान ई नीं दे रैयी है। 70 करोड़ री आबादी वाळै भारत में अेक ई ओलंपिक या विश्व स्तर रौ खिलाड़ी कीं हुवण रौ कोई अेक पक्ष तो हुय नीं सकै। इण शर्मनाक स्थिति माथै काबू पावणौ भोत जरूरी है।

 

जे. अेस. बावा : इण बारै में इणरै अलावा और ई कीं कैवणौ चावौ?

 

करणीसिंह : बस, म्हारौ तो इतणौ तो ई कैवणौ है के कोई ई खिलाड़ी खेलां री दुनिया में आगै आवणौ चावै तो उणरौ पैलौ काम है के बो अपणै आपनै उण मांय खपा देवै। जद संघर्ष करण री ताकत उण में आ जावैली तो सुविधावां ई आपूं आप मिल जावैली। निसाणैबाजी री समस्यावां में सै सूं मोटी समस्या कारतूसां री है। शूंटिंग-रेंजां री समस्या सही मायनै में प्रशिक्षण री समस्या है। सही सूं हुनर री पिछाण नी हुय सकै। आखै भारत मांय अंतर्राष्ट्रीय स्तर रा दो इज रेंज है— अेक दिल्ली में जिणरी हालत खस्ता है अर दूजी बीकानेर में जठै खिलाड़ी नीं है। बंबंई, मद्रास, कलकत्ता इत्याद जगावां रा खिलाड़ी दिल्ली आ’र अभ्यास करण सूं रैया। आं मोटा स्हैरां में शूटिंग-रेंज नी हुवण सूं बठै रा खिलाड़ियां मन नै मार’र बैठ्या रैवै। आ बात तो भारत सरकार रै खेल अधिकारी रै सोचण री है।

 

जे. अेस. बावा :  आप लंबै बखत तांई संसद सदस्य ई रैया। आज ई आप राजनीति सूं जुड़्योड़ा हौ?

 

करणीसिंह : बिलकुल नीं। म्हैं राजनीति सूं पूरी तरियां संन्यास ले लियौ है। इण संबंध में म्हैं किणी भांत री बात नीं करणौ चावूं।

 

जे. अेस. बावा : नुंवी पीढी रै कुण-सै खिलाड़ी सूं आप प्रभावित हौ?

 

करणीसिंह : म्हारी निजरां में रणधीरसिंह आछा खिलाड़ी है, पण ‘सियोल अेशियाड’ में चांदी रौ तमगौ जीतण वाळी सोमा दत्ता नै म्हैं ऊंची खिलाडी मानूं। म्हारी मान्यता है के आ लड़की 1988 में ‘सियोल ओलंपिक’ में ई आछौ नांव करसी। अर जे कोई तमगौ ई जीत लावै तो कोई इचरज री बात नीं है।

 

जे. अेस. बावा :  आपनै अेशियाड खातर भारतीय दळ रौ नेतृत्व रौ भार संभळायौ जावै तो आपनै किस्यौक लागसी?

 

करणीसिंह : म्हारै वास्तै आ भोत ई गौरव री बात हुवैली, जिण दिन म्हैं देस रै पूरै दळ रौ नेतृत्व करूंला। बो दिन तो म्हैं कदैई नीं भूल सकूंला।

 

असल में इण बात नै देख’र हर मिनख नै झुकणौ पड़ै के आपणै देस री ‘शूटिंग’ अर दूजा खेलां री भोत दयनीय हालत हुय रैयी है। इणरा जिम्मेदार आपां लोग इज हां। खिलाड़ियां मांय उछाव री कमी अर सुविधावां रै अभाव री कमी रै कारण ओ देस दूजै देसां रै सामी सिर उठावणजोगौ नीं है। इणी भांत आपां चुप रैया तो और ई लारै पूग जावांला। स्वतंत्र भारत रै खिलाड़ियां नै दूजै देसां सूं आगै लावण खातर क्रांतिकारी कदम उठायां बिना आपणौ भलौ नीं हुय सकै। इण बात माथै जल्दी सं जल्दी विचार कर’र काम करण री जरूरत है।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : करणीसिंह सूं जे. अेस. बावा री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जुलाई 1987
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