जिका जळम सूं गेला है

वे बणियां छेला है

मजनूं बण मरग्या भोळा

आंख्यां दीठ लैला है

गाबा जितरा है धवळा

उतरा मन रा मेला है

लाखां री बातां छमकै

जेबां नहीं अधेला है

तीतर पंखी आभै में

अवस हुवणां खेला है

चौकी चाल ढब्यां के व्है

म्हारै हाथां नेला है

गुरुजी गुड़ रेग्या पण

सक्कर बणग्या चेला है

कीकर थाळ परुसां थानै

म्हां सगळां के तेला है।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत फरवरी-मार्च ,
  • सिरजक : पवन पहाड़िया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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