बणज्यारी थारो बणज्यारो मन मोजी।
कांई देख्यो, कांई परख्यो, कीं पै मोइत होगी।
नजर-नजर सूं घायल, सोरम-सोरम पै भरमावै।
रूप-रूप पै रपटै, सरवर-सरवर गोच्यो खावै।
मत दे अतनी ढील, लहर बाळू का पगल्या धोगी।
गांव-गांव घाटो भुगत्यो, मन बार-बार टूट्यो छै।
नगर-नगर नांकतणा मलग्या डगर-डगर लूट्यो छै।
मान मनावण छोड़ मजेजण, या अण होणी होगी।
करड़ो कर बच्यार बाळद अर बणज्यारा पै छाजा।
ऊं की उजास की आस लियां सूधी पग डण्डी आजा।
जाग-जाग भोळी बणज्यारी सो बा की हद होगी।