बणज्यारी थारो बणज्यारो मन मोजी।

कांई देख्यो, कांई परख्यो, कीं पै मोइत होगी।

नजर-नजर सूं घायल, सोरम-सोरम पै भरमावै।

रूप-रूप पै रपटै, सरवर-सरवर गोच्यो खावै।

मत दे अतनी ढील, लहर बाळू का पगल्या धोगी।

गांव-गांव घाटो भुगत्यो, मन बार-बार टूट्यो छै।

नगर-नगर नांकतणा मलग्या डगर-डगर लूट्यो छै।

मान मनावण छोड़ मजेजण, या अण होणी होगी।

करड़ो कर बच्यार बाळद अर बणज्यारा पै छाजा।

ऊं की उजास की आस लियां सूधी पग डण्डी आजा।

जाग-जाग भोळी बणज्यारी सो बा की हद होगी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : गिरधारीलाल मालव ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 18
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