धन बळ बुद्धी को अरै कदीं थूं गरब गुमान मती करजे।
अती बुरी पण अती करै गुरु चरणा प्रीत अती करजे॥
चार दिनां की चटक चानणी आठ रात अंधियारी की।
काळ खाळ जळ सूं गळ जासी या मूरत है गारा की॥
अेक घड़ी तो घणी गिणादी नहीं भरोसो इक पल को।
सब अणजाण देस बिराणा चाल चलावो चल-चल को॥
परम ब्रह्म थूं हर बन्दा की दाता परम गती करजे।
अती बुरी पण अती करै गुरु चरणा प्रीत अती करजे॥
अगर-मगर क्यूं कैसे में भगती मैं बुद्धी बाधक ज्यूं।
सम्पूर्ण समरपण करतां मैं भावां की सुद्धी साधक ज्यूं॥
सतगुरु की सेवा सरधा मैं ज्यूं तरक ताण नै ठौर नहीं।
संशय वाळी घौर रात को छौर नहीं है भौर नहीं॥
जळ बिन मीन स्वाती बिन चातक अतरी मीत मती करजे।
अती बुरी पण अती करै गुरु चरणा प्रीत करजे॥
दाता दीन दयालू थैं दुखियां रा संकट काटो तो।
दुनियां का पीड़ित प्राण्यां मैं थै प्रेम भाव सुख बांटो तो॥
सुन्दर काया कद कुड़सी को झूंठो अभिमान नहीं करणो।
नीच ऊंच को भेद मिटा सबको सनमान सही करणो॥
हर बन्दा मैं प्रभु नित नन्दा अतरो जोग जती करजे।
अती बुरी पण अती करै गुरु चरणा प्रीत करजे॥
गुरु पूनम पर थूं सतगुरु को रक्षा कवच बंधातो जा।
विसय बासना का बिस नै थूं काळी धार खंदातो जा॥
सतगुरु का चरणां मैं सारी धरती का तीरथ करलै।
हरे राम को हरी किरतन भव तारण कीरत भरलै॥
गुरु द्वारै गुरु मारग चलतां सेवक लार सती करजे।
अती बुरी पण अती करै गुरु चरणां प्रीत अती करजे॥