धूजी धरती, आई बांवळ, सूरज आंथ्यो दिन धौळै

चूक्यो हाथ चलतो कीकर, चाकी क्यूं चाली भोळै

सांयत रोवै, नैण गमावै, म्हारी मोटी ढाल हो

सिरमौड़ जवाहरलाल हो।

अरे बिधाता, कलम ढाबली दिवो बुझ्यो सिंसार रो

जोत जगत री, जुग रो रूपक, धरती रो आधार हो

मिनखपणै रो भाव उतरग्यो, बाग-मानवी ऊजड़ग्यो

पंचसील रो झरणो सूखै जळ आगै ताळा जड़ग्यो

कण-कण इण धरती रो कैवै, रोतो रातो-लाल हो

सिरमौड़ जवाहरलाल हो।

टाबरिया बिलखै, अब किणनै चाचो कैय पुकारैला

सुख रो सूरज ढळग्यो, दुख में किणनै हेला मारांला

लाल-किलो आंसू ढळकावै, जमना रो कळपै जिवड़ो

अरे भाखरा-नागळ रोवै, दिल्ली रो रोवै हिवड़ो

आभै सिरखो ऊंचो म्हारो, चौड़ो भाल-विसाळ हो

सिरमौड़ जवाहरलाल हो।

रूसी अर अमरीकी बिलखै, दोस्त-भायलो कठै गयो?

लंकाळा, अफरीकी सिसकै, मींत-भायलो कठै गयो?

धरती ऊपर सुरग उतारण, सुरग-लोक-क्यूं चल्यो गयो?

जनता रो लाडेसर नेता, लाल-जवाहरलाल हो!

सिरमौड़ जवाहरलाल हो।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : अर्जुनसिंह शेखावत ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : नवम्बर
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