इक पंथी पंथ चलतौ, बन सिंहनि माहि पहुंतौ।

भूलौ ऊबट दह दिसि धावै, वह मारग कहिंयन पावै।

पावै मारग विषम वन मैं, फिरै भ्रमि भटकत हो।

देखियौ तहां सामहौ आवत, गरुव गज मयंमत हो।

सौ रौद्र रूप प्रचंड सुंडा, दंड फैरै रिस भर्‌यौ।

भयभीत होइ कंपिया लागी, पथिक चित्त अंतरि डर्‌यौ॥

ता देखि सु पंथी भागौ, वाकी पूठिहिं कुंजर लागौ।

जीव कैं डरि आतुर घायौ, आगै कूप हुतौ त्रिण छायौ।

त्रिण छयौ कूप जुहु तौ आगै, बिचि वेलि छवि रह्यौ।

तिहि माहि पथिक पड़्यौ अजानत, भेद भौंदू ना लह्यौ।

वंहि गही अवलंबि बांकारणि, और कछु पाइयौ।

कूचडौ एक सरकनौ केरौ, पड़त हाथें आइयौ॥

तब सरकन दिढ करि गहियौ, झूलत दारण दुख सहियौ।

सिर ऊपर गदौ गयंदा, दिसि च्यार्‌यौ चारि फुणिंदौ।

चहुं दिसि हि चारि फुणिंद न्यौली, बधे करि बैठे जहां।

तलि मुख पसारि विरह्यौ अजिगर, ग्रसन कै कारणि तहां।

सित असित द्वै देखिया मूषक, जड़ खणै सरक्न तणी।

संकट पड़्यौ अब नहिं उबरण, करै चिंता चिते घणी॥

कुवा ढिग इक विरख बड़े रौ, तहां छातौ लग्यौ महुके रौ।

नहिं हंसती हलाई डाली, मोखी अगनित उड़ी विसाली।

मोखी विसाली उडिवि अगनित, लगि उडी वैहि नर तणै।

उपसर्ग अंगि करै घणैरी, तास को संख्या गिणै।

वहि समै मधुकण अहर ऊपरि, पड़त रस रसना लियौ।

वा बिन्दु कै सुखि लागी लोभी, सबै दुख वीसरि गयौ॥

मधु बिन्दु जु सुख संसारो, दुख बरणत लहुं वनयारौ।

जीव जाणो पथिक समानो, अग्यान निवड़ उद्यानो।

उद्यान घन अग्यान गिनिजै, जम भयानक कुंजरो।

भव अंध कूपरु चारो गति, अहि मखिक व्याधि निरंतरो।

अजिगर सु एहु निगोद वोयम, भखत जगत धापये।

द्वै पक्ष उज्जवल किसन मूषक, आयु खिण खिण का पये॥

संसार कौ यहु व्यवहारो, चित चेत हुं क्यों गवारौ।

मोह निद्रा मैं जे सूता, ते प्राणी अति बिगूता।

प्राणी विगूता बहुत ते जिनि, परम ब्रह्मा विसारीयौ।

भ्रमि भूलि इंद्री तणै रसिनर, जनम सह्या छीहल कहै।

करि धर्म जिन भाषित जुगति स्यौ, त्यौ मुकति पदवी लहै॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै