बणज करलै रै आज की रात।

लद जाणो परभात।

कतनी पूंजी लायो लारां

करलै मन की बैठ बजारां।

घाटो बाधो सोच करै क्यूं?

खरी बचालै साख

बणज कर्‌यो महता नरसी नै

कुण करियो, कोई करसी न्ह

सांवरियां सो सेठ हुयो न्ह

नानी बाई सो भात।

नजर्‌यां इन्दर धनक जब ताणै।

डूब कै तर थारी तू जाणै।

जे रुत जतनी हो सुहावंणी।

उतनी करती घात।

लख आया लख गया रै बटोई।

पगडण्डी कद कुण की होई

आंख्या हाळा राह भटक ग्या।

आंधा की कांई बात।

स्रोत
  • पोथी : अेक घडी़ पाछै परभात ,
  • सिरजक : गिरधारी लाल मालव
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