हेलीऽऽ भीतर भंवै है अणहद नाद

बोल्यां भिजोग ऽऽ पड़ै।

सारंगी संग सबद उचरै

लुळ-लुळ नाचै गीत

बांसरी री बात सुरीली

संग पुराणी रीत॥

हवळा-हवळा थूं बतळाजे अे

भीतरऽऽ राग भंवै।

डैरूं डमरू झांझ मंजीरा

इकतारै री ताल

बाजै हेली जी मुळकणा

माळी हेली ना लखै तो

लखवण दीठ दिराय।

जोत-जोत सूं दीखसी हेली

ग्यान जोत फिराय॥

भीतर नै बोली दीजे अै

वो थारै संगऽऽ जीवै।

भीतरऽऽ राग भंवै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बी.एल. माली ‘अशांत’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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