धुतारड़ी मेदनी जगत सोह धुतीयो, नेह ते मेदनी सुन कीजै।
अलाह रसूल सूं आपंण काम छ, अलाह सूं अति घंणो नेह कीजै॥
केतल कंम कले क्रंमणे कायरे, झांम चीठी तणे लोभ कीधो।
अरथ अपराधी पातां तणां तसकरां, छे तरि गई पंण्य क्यौं न सीधो॥
दुंनी दिन च्यारि क पांच-पांच पन्ह, एतली आवली झीण आव।
अलाह रीदी सती आयीय रे रीदा, एतली आखरि तो साथि आव॥
प्रीति प्रजाति मेदनी सु मकरि, मानवी लाहंण मैं चुकि मोटी।
खुदाय रीदो सती खरचीय खेचरी, खरचीय नहीं तें श्रब खोटी॥
निमरमी निलजी जंवर नीस कारड़ी, नारंणी निवल नीं तपनी नीनेही।
पतगरी नहीं महंमद पकंबरी, तीह कुपत नीं दुंनी नीं प्रीति केही॥
दुंनी नो अंति घंणो लोभ दुसारीय, कांम चीठी तंणो केम कीज।
आपरे हाथ ते हाथ अवरा तंणां छे, तरि जाय पंण्य क्यौं न सीझ॥
पर उदगार महंमद पगंबर, दुंनी सुंवार वकारि दीधी।
आदि वखांण सुरतांण अंबीयां तंणो, फकर कबुलीयो पलटि कीधी॥
बांण पतवार षट चक्रवती खलक मां, खिल जासुं दुंनी बहुत खेली।
मांहरी मांहरी कांय करि मुरिखा, मेदनी केतला गया मेल्ही॥
करंन दधीच सतवत राजा सीवरि, मुंज भोज गयो कीणी नमांणी।
जीप्य करि हरिया जांणते पांणते, ए दुंनी आपंणी करे जांणी॥
सीखिया कागनी चाल सवारथी, हंस गति वीसरी लोभ हीलीया।
तांहरो तेजीया केवहों गंजो, सेखम सायख बोहत छलीया॥