गजब धाक दध लगा आठूं पोहोर पूगता,

चोहोर मुख ऊगतां खलां चूभौ।

सजे किम नींव वत्रधर अवनी सही,

अजै छत्रधर रामेण ऊभौ॥

पियै जळ केहरी गाय इक घाट प्रति,

भुजंग सिखरे हरी इकठ भाळो।

कळू क्रत बधाळत जपै दुनियाण किम,

अदाळत तपै बिसनेस वाळो॥

रिमहरां वहण पतसाह सरणे रहण,

चाह कर कीरती लहण चित पै।

क्रम ग्रहण नीच दुनियाण करें करां,

पाण रो महण चहुवाण प्रतपै॥

जोर की माड साहंस रावण जिसै,

बीजलां वंस सीमाड़ बाढ़ौ।

साहियां उछब उरजाद आचां,

सुपोह हिंदवां तणी मुरजाद हाडौ॥

स्रोत
  • पोथी : बलवद विलास ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. सौभाग्यसिंह शेखावत ,
  • प्रकाशक : निदेशक राजस्ठान साहित्य अकादमी (संगम) उदयपुर, राजस्थान ,
  • संस्करण : प्रथम
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