पड़ी मिनख में काण

रचावै मेहंदी और मसाण

बगत रा आखर गळता जाय

भाग रा लेखा टळता जाय

नीत रै पगल्यां रा सैनाण

सुणो भाई!

पड़ी मिनख में काण

अणूता आभै उखळ्या फूल

भूल पर करता जावै भूल

गिणै सपनां में सूता लैर

निभावै करियै वाळो बैर

मच्यो अकलां रो जुद्ध अजाण

सुणो भाई!

पड़ी मिनख में काण

तावड़ै ज्यूं सरकै ओसाण

डाळ रा पाना झड़ता जाय

बतीसी रा बळ पड़ता जाय

निजर रा ओछा पड़्या निसाण

सुणो भाई!

पड़ी मिनख में काण

जमीं पर इंदर ज्यूं घैराय

झुकै पण बिन बरस्यां ही जाय

थथोबा देवण में हुसियार

बारणा काढै सो-सो बार

रैया नीं खुद री छिंया पिछाण

सुणो भाई!

पड़ी मिनख में काण

दीखतां के देणो परमाण

निजाणां किण रै पांती आय

करम रा मोर्‌या कद उड जाय

सुणो भाई!

पड़ी मिनख में काण।

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : वेद व्यास ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 11-12 (नवम्बर-दिसम्बर)
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