गुण गजेन्द्र मैमंत चले कळिजुग्ग सरोवरि।
असत ग्राह तै वीचि तेणि वद्धौ पग चौखरि॥
लालचि जलि लीजतौ एक वकि जीव उमग्गे।
करि वखांण वहस्सियौ ताम को प्राण न लग्गे।
कवि भगति चाड माहेस का नर सुरिंद आवै न को।
आचार सूंडि बूडत अगो हरि रतंन उव्वारि हो॥
सुणि पुकार केवार समथ विंद्राज संभारे।
अस्सि गुरडि आ रहे वेख नह काइ विचारे।
कवि भगत कारणै अभंग भुज चित्त उपाडे।
सत्त वृत्त राखियौ असत तांतू विव्भाडे।
चक्र मौज वाहि चूड़ा हरै व्रवण माल फंद वाढियौ।
महाराजि रतन जुग समंद्र मझि गुण गजेन्द्र इम काढियौ॥
मिले राति कळिजुग्ग असत अंधार निवाहर।
मोह लोह निन्द्र मैं सुको सुत्ता राजेसर।
जस पौहरे घण जांण जोध जोधा छळ जग्गे।
दिये दंन सोव्रंन ऊंध उपजस्सन लग्गे।
संभ्रम महेस नव खंड सिरि प्रसिध जोति जग पस्सरी।
क्षत्र ध्रंम रहे रतनौ क्षत्री किरि चिराक कीरत्ति री॥