जठै गियो जंग जीपियो, खटकै वीण रणखेत।

तकड़ो लड़ियो तांतियो, हिंद थान रै हेत॥

मचायो हिंद में आखी तहलको तांतियै मोटो,

घोटो जेम घुमायो लंक में हणूं घोर।

रचायो रूंळती राजपूती रो आखरी रंग,

जंग में दिखायो सुवायो अधाग जोर॥

हुय हतास राजपूती छंडियो छत्रियां हाथ,

साथ चंगो सोधियो दिक्खणी महा सूर।

बिड़द धार छतीसां बंस रो रणां बांको बीर,

नीर धारी हिन्द रो बंचायो सागी नूर॥

खजाणां लूटिया सो तो डावोड़ै हाथ रा खेळा,

बेळां गोळां बरसंतां खोसली तोपां भौत।

हरजाणां भराया फोजां पालटी दोयणां हूंत,

फिरंगां जयचन्दां नै खिलातो गियो फौत॥

पळकती अकास बीज कठै ही जांवती पड़ै,

छड़ै तांतियै री व्हैगी इसी ही छलांग।

खळकती नद्यां रा खाळ मांय हूंतो पाड़ खड़ै,

लड़ै इणां विधी लाखां हूंत एकलांग॥

मचायो हिंद में आखी तहलको तांतियै मोटो...

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निर्माता: शंकरदान सामौर ,
  • सिरजक : शंकरदान सामौर ,
  • संपादक : भंवरसिंह सामौर ,
  • प्रकाशक : केंद्रीय साहित्य अकादमी ,
  • संस्करण : प्रथम
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