(महाराजा बलवन्तसिंह गोठड़े)
बडा बोलतो बोल उदमाद कर तौ बिढण।
तोल तो खाग भुज बढण ताया॥
जुध खळां न देस्यूं पूठ कह तौ जिकौ।
ऊठ चहुवाण मिजमान आया॥
बाज तासा घमक हींस घोड़ा बिखम।
चमक तोड़ा अमक झाळ चोवै॥
भाखतौ लड़ूं खग झाट मन भावणा।
जके दळ पांवणा वाट जोवै॥
जाग चामल गिरद कीध घाटा जपत।
लाग आंटा सपत गीध लूभा॥
काढतो बचन मुख चाव जुध कारणै।
आव भड़ बारणै कटक ऊभा॥
सुण बचन चखां तज नींद असळाक तौ।
उरड़ खग हाकतो जुध आधायौ॥
चाव भुजबलां श्रोयण अजब चाखतौ।
आखतौ खळा सिर गजब आयौ॥
घण बोह पतंग डोली बहै घायलां।
पतंग झड़ छायळां कोह पूरौ॥
ताप खग झड़ां तौड़ै कमळ तायलां
भड़ां अजरायलां बाघ भृगै॥
जगायौ सिंघ बळवंत जिम जागियो।
बागियौ दीह अंगरेज बागं॥
खीजकर खळां आधौ कटक खागियौ।
घड जितै लागियौ खाग धारां॥
अभावौ बहादर सुतन साहब उरां।
अरि घड़ा जमायौ सोक अछरीक॥
तरुण वय सम्हायौ खड़ग साहस तिके।
मरण लग निभायौ भलौ मछरीक॥