1

चाये फेरां रो टळै, लगन, महूरत जोग। 
दारू पीकर नाचर्‌या, बारातां में लोग॥

2

पूजा, अरचा, ध्यान, व्रत, छूट्या व्यसन तमाम। 
सन्ध्या विप्रां री हुई, मयखाना रै नाम॥

3

अब उन्नति रा दौर रो, अैड़ो हुयो कमाल। 
दारू पीकर झूमर्‌या है, वेस्यां रा लाल॥

4

बसती की बदली हवा, नेम हुया निस्तेज। 
रह्यो नहीं रहमान नै, दारू सूं परहेज॥

5

खेत बिक्या, गहणा विक्या, बिक्या सभी असबाब।
दारू में बेहोस है, अब भी ठाकर साब॥

6

ना बच्चा नै ड्रेस दे, ना बच्चा नै फीस। 
पतनी सूं झगड़ो करै, दारू पी जगदीश॥

7

मौसम आ ज्यावै कदै और कदै मेहमान। 
करणी पड़ती दोस्ती, दारू सूं श्रीमान॥

8

कदै-कदै अैड़ा सजल, आवै है संजोग। 
मुफत मिलै तो चाव सूं पी लेवै है लोग॥

9

बरतन, कपड़ा बेचकर, दारू पीवै लोग। 
घर घर में घर कर गयो, नशो-नशा रो रोग॥

10

ना यारी, ना दुसमनी, ना नफरत, ना प्यार। 
बिगड़्या काम सुधार दे, दारू री मनवार।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कुंदन सिंह 'सजल' ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 22
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