चाये फेरां रो टळै, लगन, महूरत जोग।
दारू पीकर नाचर्या, बारातां में लोग॥
पूजा, अरचा, ध्यान, व्रत, छूट्या व्यसन तमाम।
सन्ध्या विप्रां री हुई, मयखाना रै नाम॥
अब उन्नति रा दौर रो, अैड़ो हुयो कमाल।
दारू पीकर झूमर्या है, वेस्यां रा लाल॥
बसती की बदली हवा, नेम हुया निस्तेज।
रह्यो नहीं रहमान नै, दारू सूं परहेज॥
खेत बिक्या, गहणा विक्या, बिक्या सभी असबाब।
दारू में बेहोस है, अब भी ठाकर साब॥
ना बच्चा नै ड्रेस दे, ना बच्चा नै फीस।
पतनी सूं झगड़ो करै, दारू पी जगदीश॥
मौसम आ ज्यावै कदै और कदै मेहमान।
करणी पड़ती दोस्ती, दारू सूं श्रीमान॥
कदै कदै अैड़ा सजल, आवै है संजोग।
मुफत मिलै तो चाव सूं पी लेवै है लोग॥
बरतन, कपड़ा बेचकर, दारू पीवै लोग।
घर घर में घर कर गयो, नशो नशा रो रोग॥
ना यारी, ना दुसमनी, ना नफरत, ना प्यार।
बिगड़्या काम सुधार दे, दारू री मनवार।