जंग नगारां जाण रव, आण धगारां अंग।

तंग लियंतां तंडियौ, तोनै रंग तुरंग॥

युध्द के नगाड़ों की आवाज सुनते ही शरीर में वीर-स्फूर्ति लाकर तंग खिंचते-खिंचते ही तू नाचने लग गया। हे तुरंग (अश्व )! तुझे शाबाश है। अर्थात् वीर पुरुषों के अश्व भी युद्धोन्मादी होते हैं।

स्रोत
  • पोथी : वीर सतसई ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : नरोत्तमदास स्वामी, नरेन्द्र भानावत, लक्ष्मी कमल ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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