डूंगर केरा वाहळा, ओछां-केरा नेह।

वहता वहइ उतामळा, झटक दिखावइ छेह॥

भावार्थ :- मालवणी कहती है–पहाड़ी नाले और ओछे पुरुषों का प्रेम बहते समय तो बड़ी तेजी से बहता है पर तुरंत ही अंत दिखा देते हैं।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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