दुरगा सूं बांध्यो बयर, जसवंत मार जदीह।
ओरग बेरो खोदियो, दिल्ली री डहळीह॥
सेल घमोडा घमघमै, धुक न मन में धराह
पौड पमगा धमधम, वाह दुरग्गा वाह॥
दिल्ली रा भूभाग पर, बहता वाढाळीह।
भली बजाई करणवत, हेकण हथ ताळीह॥
पळ गिद्धा रत जोगण्या, हाड भखै सिंगाळ।
काग कळेजो, आसवत, रचियो भोजन साळ॥
सिंधू राग सुहावणा, तवी धनु टंकार
रुड नचै, राठौड़ द्रुग, यूं माण त्योहार॥
बसत मनाई आसवत, हथ झल्लै वाणास।
रण में सोणित सूं रंगै, पिसुणा किया पलास॥
भीसण ग्रीसम सूर व्है, प्रघळ तेज छित छाय।
दुरगै बिन पाणी किया, तुरक-तड़ागा ताय॥
दळ-बादळ बिच बीजुळा, खमकै बीजळियाह।
दुरगो पावस ज्यूं सजै, बहकै रत थळियाह॥
सरद चंद सूं तू सरै, आथ्या ही उदियोह।
यस उजवाळो आसवत, मुदिया नह-मु दियोह॥
भिंड दुरगो मैमत भड़, हद छाई हेमंत।
कपाणी केव्या चढ़ी, थरथरता रद-पत॥
खांडाहळ खाडा करै, रंगता पिचकारीन।
रूडी विध फागा रमै, दुरगो खेराहीन॥