संस्क्रति में घुळर्यो, किसौ कोढ़ियो अंस।
घर-घर रावण जनमिया, गांव-गांव में कंस॥
सदनां मांही चल रया, खुरसी, जूता जंग।
जनता पर भी चढ रयो, ओ संसदिया रंग॥
संवेदण सिरमट हुई, मिनखपणौ सौ खौट।
मिनखजात अब बण रयी, हाड-मांस रो बोट॥
भूख बजारां कर रयी, देही रौ व्योेपार
इसड़ै लोकतन्तर नै, लाख-लाख धिक्कार॥
पछमी संस्कृति कारणै, हुयौ इसौ बेहाल।
फुटरापौ भी बिक रयो, बण बाजारू माल॥
जाया इक मां-बाप रा, प्रेम कैयो न जाय।
आंगण आंख्यां नीं मिलै, मिलै अदालत मांय॥
उण आंगण रौ दुख दर्द, कुण समझ पावैला
जिण रौ पांखी उड परौ, पूठो नीं आवैलो॥