मानव कांई घाट घड़ै मन मांहीं,

घाट जुआ जमराज घड़ै।

जोखी जीव घड़ी में जावै,

सूनी काया पड़ी सड़ै॥

तापै घणा दीहड़ा तोही,

प्राण समापै अंत परौ।

जाया जकै अेक दिन जाणौ

काया थकां विचार करौ॥

मरिया नरां आंणै मन में,

थिरता ठांणै रह्या थका।

प्रतिमारग तांणै पूठा,

जमरांणै चढिया जका॥

रूड़ी देह बणी नहं रहसी,

घट में सोचौ घणी घणी।

पाछी खबर नाग नहं पूछै,

त्याग्योड़ी कांचळी तणी॥

मनुष्य अपने मन में जाने कैसे-कैसे अंतहीन ऊहापोहों का ताना-बाना बुनता रहता है, परन्तु यमराज उसके लिये कुछ और ही तरह का षड्यंत्र रचते हैं। मनुष्य के अनमोल प्राण तो पल भर में प्रस्थान कर जाते हैं और पीछे यह प्राण-शून्य देह पड़ी-पड़ी सड़ती रहती है॥1॥

भले ही मनुष्य कितना ही दीर्घायु क्यों हो जाए, अंत समय आने पर तों उसे प्राण त्यागने ही पड़ते हैं। प्रियजनों, इस दुनिया में जिसने भी जन्म लिया है, उसे एक दिन इसे छोड़ कर अवश्य चले जाना है। अतः शरीर रहते इस पर विचार करो॥2॥

कैसा आश्चर्य है कि अज्ञानी मनुष्य अपनी आँखों के सामने कालग्रस्त हुए प्राणियों के सम्बंध में किंचित् भी विचार नहीं करता कि आख़िर वे सब कहाँ गये? इसके विपरीत जो अभी विद्यमान हैं, वे अपने मन में यही सोचते हैं कि सदा इसी प्रकार इस दुनिया में स्थायी रूप से बने ही रहेंगे। लेकिन जो जीव मृत्यु-पथ पर आरूढ़ हैं, उन्हें खींच कर पुनः कोई वापिस नहीं ला सकता॥3॥

यह ध्रुव सत्य है कि तुम्हारी यह सुन्दर देह-यष्टि सदा स्थायी रहने वाली नहीं है, यद्यपि तुमने तो अपने मन में इसके लिए बड़ी बड़ी कल्पनाएँ कर रखी हैं। सर्प भी जब अपनी केंचुली उतार कर फेंक देता है तो वह वापस मुड़ कर कभी उसकी सुधि नहीं लेता। वैसे ही, जीवात्मा भी प्राणांत के बाद अपनी विगत देह के सम्बंध में किसी प्रकार की सुधि नहीं रखता॥4॥

स्रोत
  • पोथी : ओपा आढ़ा काव्य सञ्चयन ,
  • सिरजक : ओपा आढ़ा ,
  • संपादक : फतह सिंह मानव ,
  • प्रकाशक : सहित्य अकादेमी- पैली खेप
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