उदरि मज्झि दस मासु, पिंड पाइयै बहुत दुख।
उर्ध होइ दुइ चरण, रयणि दिन रहइ अधोमुख।
गरभ अवस्था अधिक जाणि चिंता चितै चित्त।
जो छूटो इहि बार, बहुरि करहौ निज सुकृत।
बोलइ जु बोल संकट पड़इ, बहुरि जन्म जग महिं भयौ।
लागी जु वाउ छीहल कहइ, सबै मूढ़ बीसरि गयौ॥