रितु ग्रीषम रवि किरण, प्रबल आगइ निरंतर।
पावक सलिल समूह, अधर झिल्लउ धारा धर।
सीतकाल सीतल तुषार, दूरंतर टाल्यउ।
पत्त सही दुखत्थ, अधिक मित्तप्पण पाल्यउ।
रे रे पलास छीहल कहै, धिक धिक जीवन तुझ तणौ।
फुल्लयौ पत्त अब मूढ़ तजि, ए अजुत्त कीधी घणौ॥