रितु ग्रीषम रवि किरण, प्रबल आगइ निरंतर।

पावक सलिल समूह, अधर झिल्लउ धारा धर।

सीतकाल सीतल तुषार, दूरंतर टाल्यउ।

पत्त सही दुखत्थ, अधिक मित्तप्पण पाल्यउ।

रे रे पलास छीहल कहै, धिक धिक जीवन तुझ तणौ।

फुल्लयौ पत्त अब मूढ़ तजि, अजुत्त कीधी घणौ॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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