थोरौ थोरौ माहिं, समय कछु सुकृति कीजइ।
विनय सहित करि हित्त, वित्त सारै दिन दीजइ।
जब लगि सांस सरीर, मूढ विलसहु निज हत्थहिं।
मुवां पछै लपटी, लच्छि लग्गै नहिं सत्थहिं।
छीहल कहइ बीसल नृपति, संचि कोड़ि उगणीस दव्वु।
लाहो न लियौ भोगब्बि करि, अंतकाल गो छांडि सव्वु॥