थोरौ थोरौ माहिं, समय कछु सुकृति कीजइ।

विनय सहित करि हित्त, वित्त सारै दिन दीजइ।

जब लगि सांस सरीर, मूढ विलसहु निज हत्थहिं।

मुवां पछै लपटी, लच्छि लग्गै नहिं सत्थहिं।

छीहल कहइ बीसल नृपति, संचि कोड़ि उगणीस दव्वु।

लाहो लियौ भोगब्बि करि, अंतकाल गो छांडि सव्वु॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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