सबळ पवन उतपन्न, अगिनि उड़ि फंद दहे सब।

ततखिण धन बरसत, तेज दावानल गौ तब।

दिसि दाहिणी जु स्वान, पेखि जबुंक कौ धावउ।

जब जान्यौ मृत जात, चित्त पारधी रियासउ।

ताणत धनुष गुण तुट्ठिगौ, दिसि च्यारउं मुगती भई।

छीहल को मारवि सकै, जिहि रख्खण हारा दई॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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