सबळ पवन उतपन्न, अगिनि उड़ि फंद दहे सब।
ततखिण धन बरसत, तेज दावानल गौ तब।
दिसि दाहिणी जु स्वान, पेखि जबुंक कौ धावउ।
जब जान्यौ मृत जात, चित्त पारधी रियासउ।
ताणत धनुष गुण तुट्ठिगौ, दिसि च्यारउं मुगती भई।
छीहल न को मारवि सकै, जिहि रख्खण हारा दई॥