सेख समो पहिचानि स्वामि सेवग न बिचारौ।
काँम रूप तुम पुरुष बीर बानैत उदारौ॥
बहुत काल अभिलाख रही जिय मैं यह भारी।
कौन समो वह होय मिलै महिमा गुनबारी॥
सुइ करिय आज साहिब सहल, सकल मनोरथ सिद्ध हुव।
दै योग भोग संयोग यह, कौन दोस जग देहु तुव॥