रीति होइ सो भरै, भरी खिण इक वै ढाळै।

राई मेर समाणि, मेर जड़ सहित उखाळे।

उदधि सोखि थळ करै, थळहिं जळ पूरि रहै अति।

नृपति मंगावइ भीख, रंक कूं थपै छत्रपति।

सब विधि समर्थ भंजन घड़न, कवि छीहल इमि उच्चरै।

इक निमिष मांहि करता, पुरुष करण चहै सोई करै॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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