अरजण हुतो अगै, बढ़ण जदुपत बिरदायौ।
निपट अगै ज्वाळनळ, पवन वाळौ बळ पायौ।
गोरख हुतो अगै, गुरू माछंदर धारे।
दहण सेन दांणवी, हणू कन रांम हकारै।
करण माहाबळ करण, अगै कुरुपत ऊचरणै।
अगै पाल राठोड़, वळै 'मोडौकव' वरणै।
कळसीस नांम अवचल करण, सूरज तेरै साख रो।
भालाळ तणौ रूपण भणूं, जो बांधव नवलाख रो॥
भावार्थ :- अर्जुन धनुर्विद्या में तो निपुण था ही, मगर रणक्षेत्र में यादवों के राजा (श्रीकृष्ण) ने बखान करके और जोश भर दिया। अग्नि स्वयं प्रचण्ड दाह करने वाली तो है ही, उधर हवा के वेग से उसमें और अधिक शक्ति का संचार हो गया। गोरख तप, साधना में स्वयं महाबली था, मच्छींद्रनाथ जैसा योगी गुरु रूप में और मिल गया। दानव रावण की सेना का संहार कर रहे हनुमान को मानो राम ने ललकारा हो। महाबली कर्ण को और अधिक बलशाली करने के लिए कौरवों के राजा (दुर्योधन) ने ललकारा हो। उसी प्रकार पाबू स्वयं अतुल्य पराक्रमी और वीर है। उधर उसका वर्णन मैं महाकवि मोडदान कर रहा हूँ, जिसका नाम पृथ्वी पर सदैव अविचल और अमर रहेगा। जो राठौड़ वंश की तेरह शाखाओं के सूर्य के समान है। उस भालाधारक का मैं वर्णन कर रहा हूँ जो नौ लाख शक्ति अर्थात् शक्ति देवल का भाई है।