नीच सरिस नहीं प्रीति, बैर कीजइ न अवस करि।
मध्य भाइ आछियै, संग छांडिय दूरंतरि।
हित अथवा अनहित, चित चिंतवै बुरि मति।
निसचय सुख की हानि, दुख्ख उपजै दहूं गति।
छीहल कहै पिख्खहु प्रगट, कर अंगारहिं कोउ धरै।
दाझै निबद्ध तातौ लियै, सीरौ कारौ कर करै॥