घरी घरी नृप गेहि, एह घड़ियालउ बज्जै।

कहै पुकारि पुकारि, आउ खिणहि खिण छीज्जै।

संपति सांस सरीर, सदा नर नाही निसचल।

पुरइणि पत्र पतत बूंद, जळ लव जिमि चंचल।

इमि जानि जगत जातौ, सकल चित चेतौ रे मूढ नर।

ऊवरै जु तौ छीहल कहइ, दीजिइ दाहिण उच्चकर॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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