इंद्रजीत सुणि एम, कह्यौ रावण सूं हित करि।

कितौक दळ रांम को, सरब मारूं समहरि॥

रथ साजै चढि रीस, ईस बर मांगि अभंगी।

चोड़ै चढि चालियौ, राम सेना चतुरंगी।

थरहरे जमी परबत थरर, नाद घरर त्रंब नाम सूं।

उण बार आय भड़ियौ असुर, रावण को सुत राम सूं॥

स्रोत
  • पोथी : राम रंजाट ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. उषाकंवर राठौड़ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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