भ्रमर इक्क निसि भ्रमै, परौ पंकज के संपुटि।
मन महि मंडै आस, रयणि पिण माहिं जाइ घटि।
करि हैं जलज विकास, सूर परभाति उदय जब।
मधुकर मन चिंतवै, मुक्त व्है हैं बंधव तब।
छीहल द्विरद ताही समय, सर सपत्तउ दइव वसि।
अलि कमल पत्र पुडइणि सहित, निमिय माहि सौ गयौ ग्रसि॥